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शब्दार्थ तुम को ए० ऐसा आ० कहते हैं दे देवलोक में. अ० आर्य दे० देवों की ज० जघन्य द० दशः वा० वर्ष *
स. सहस्र ठिः स्थिति ५० प्ररूपी तं० वैसे ही स० समयाधिक जा. यावत् ते. इस से ५० आगे वो० विच्छेद दे. देव दे देवलोक स० सत्य ए० यह अ० अर्थ ॥ ७ ॥ अ० मैं पु० पुन: अ० आर्य पूर्ववत् म ॥८॥ त तब ते वस० श्रमणोपासक स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर की अंक पास से एक यह
पण्णत्ता, तंचेव समयाहिया जाव तेणपरं वोच्छिण्णा देवाय देवलोगाय सच्चेणं एसमटे ; ॥ ७ ॥ अहं पुण अजो! एव माइक्खामि जाव परुवेमि, देवलोगेमुणं अज्जो! देवाणं जहणेणं दसवास सहस्साइं तंचेव जाव तेणपरं वोच्छिण्णा देवाय देवलोगाय सच्चेणं एसमटे ॥ ८ ॥ तएणं ते समणोवासगा समणस्सं भगवओ
महावीरस्स अंतियाओ एयमढे सोचा णिसम्म समणं भगवं महावीरं वंदति णमंसंति भावार्थ श्रमणोपासकने जो तुम को कहा है कि देवों की जघन्य दश हजार वर्ष उत्कृष्ट तेत्तीस सागरोपम की
स्थिति है आगे नहीं है. यह अर्थ सत्य है ॥ ७ ॥ अहो आर्यों ! मैं भी वैसा ही कहता हूं यावत् प्ररूपता हूं कि देवलोक में देवताओं की जघन्य दश हजार वर्ष की उत्कृष्ट तेत्तीस सागरोपम की स्थिति कही
आगे स्थिति का विच्छेद होता है ॥ ८ ॥ फीर उक्त श्रमणोपासक श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामीकी सपास से ऐसा अर्थ सुनकर अवधार कर भगवंत श्री महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर ऋषिभद्र पुत्री
42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी ..
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी जालाप्रसादजी *
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