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शब्दार्थ
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पंचमांम विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र <
भं० भगवन् इ० ऋषिभद्रपुत्र स० श्रमणोपासक अ० हम को एक ऐसा आ. कहते हैं जा. यावत् ए. ऐसा प० प्ररूपते हैं दे. देवलोक में अ० आर्य दे देवों की ज० जघन्य ३० दशवर्ष स. सहस्र ठि. स्थिति पापी इस से स. समयाधिक जा. यावत् ते. इस मे वो. विच्छेद दे. देव दे०११ देवलोक से. अथक कैमे भं० भगवन् ऐ. ऐसे अ० आर्य स. श्रमण भ० भगवंत म. पहावीर ते० उन स० श्रमणापासक को एक ऐसा व० बोले जं. जो अ० आर्य इ० ऋषिभद्रपुत्र स० श्रमणोपासक तु.
पुत्ते समणोवासए अम्हं एवमाइक्खइ जाव एवं परुवेइ देवलोएसुणं अजो ! देवाणं जहण्णेणं दसवाससहस्साई ठिई पण्णत्ता, तेणपरं समयाहिया जाव तेणपरं वोच्छि. ण्णा देवाय देवलोगाय ॥ से कहमेयं भंते ! एवं ? अजोत्ति ! समणे भगवं महावीरे ते समणोवासए एवं क्यासी जंणं अजो! इसिभद्दपुत्ते समणोवासए तुझं एवमा
इक्खइ जाव परूबेइ देवलोगेसुणं अज्जो ! देवाणं जहण्णेणं दसवाससहस्साइं ठिई। वन् ! ऋपिभद्र पुत्र नामक श्रमणोपासक हम को ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं कि अहो आर्यो ! देव
क में देवताओं की जघन्य दश हजार वर्ष की स्थिति कही है पीछे एक दो यावत् दश, संख्यात असंख समय की वृद्धि करते उत्कृष्ट तेत्तीस मागरोपम की स्थिति कही है. बाद में स्थिति का विच्छेद होता है. अहो भगवन् ! यह किस तरह है ? श्रमण भगवंत महावीर स्वामी बोले कि अहो आर्यो ! ऋषिभद्रपुत्र ।
अग्यारखा शतक का बारहवा उद्देशा <3
भावार्थे
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