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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
4008- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
शंखवन चे० उद्यान व वर्णन युक्त १० वहां आ० आलेभिका न० नगरी में ब० बहुत इ० ऋषभद्र पुत्र प प्रमुख स० श्रमणोपासक पर रहते थे अ० ऋद्धिवंत जा० यावत् अ० अपरिभूत अ० जाने हवे जी० जीव अजीव जा० यावत वि० विचरते थे ॥ १ ॥ त० तब ते० उन स० श्रमणोपासकों को अ० एकदा ए० एकत्रित स० मीले दुवे स० साथ स० बैठे हुवे अ० यह ए० ऐसा पि० परस्पर क० कथा अ० अध्यवसाय स० उत्पन्न हुवा दे देवलोक में अ० आर्य दे देवों की कं० कितने काल की ठि० स्थिति पर कही त तब इ० ऋषिभद्र पुत्र स० श्रमणोपासक दे० देवस्थिति ग० जानी हुई ते उन स वण्णओ, तत्थणं आलंभिया णयरीए बहवे इसिभदपुत्तप्पमोक्खा समणोवासग! परिवसंति, अड्ढे जाव अपरिभूए, अभिगय जीवा जीवा जाव विहरति ॥ १ ॥ त तेसिं समणोवासयाणं अण्णदा कयायि एगयओ समुवागयाणं सहियाणं समुविट्ठाणं सण्णिसण्णाणं अयमेयारूवे मिहोक हा समुल्लावे अन्भत्थिए समुप्पज्जित्था, देवलोएसुणं अजो देवाणं केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता ? तरणं से इसिभद्दपुत्ते समणोवासए देव समय में आरंभिका नामक नगरी थी. उस का वर्णन उववाइ जैसे जानना. उस की ईशान कौन में शंखवन नामक उद्यान था. उस आलंभिका नगरी में ऋषिभद्र पुत्र प्रमुख बहुत श्रमणोपासक ऋद्धिवाले यावत् | अपरिभूत व जीवाजीव के स्वरूप जाननेवाले रहते थे || १ || एकदा वे श्रमणोपासक मीलकर बैठे
ॐ अग्यारहवा शतक का बारहवा उद्देशा
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