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शब्दार्थ
भावार्थ
48 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
शृंगाटक)
जा० यावत् पं० पांच अ० अनगार स० सो की स० साथ सं० परवरेहुवे पु० पूर्वानुपूर्वी च० चलते हुए [गा० ग्रामानुग्राम दु० विचरते हुवे जे० जहां ह० हस्तिनापुर न० नगर जे० जहां स० सहस्रवन उ० उद्यान ते वहां उ० आकर अ० यथा प्रतिरूप उ० अवग्रह उ० याचकर सं० संयम त तप से अ० आत्माको भा० विचारते जा० याक्त् वि० विचरते हैं ॥ ३८ ॥ तं तब ह० हस्तिनापुर न० नगर में सिं० ति० त्रिक जा० यावत् १० परिषदा प० पर्युपासना करने लगी. त० तब त उस म० महाबल कु· पंचहिं अणगारसएहिं सद्धिं संपरिवुडे, पुत्राणुपुत्रि चरमाणे गामाणुगामं दूइजमाणे जेणेव हत्थिणाउरे णयरे जेणेव सहसंववणे उज्जाणे तेणेव उवागच्छइ २ त्ता अहापंडरू उग्गहं उगिण्हइत्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे जाव विहरइ ॥ ३८ ॥ तणं हथिणापुरे यरे सिंघाडगतिय जाव परिसा पज्जुवासइ ॥ तएणं तस्स महन्त्र• लस्स कुमारस्स तं महया जणसदंबा जणबूहंवा एवं जहेब जमाली तहेव वित्ता साधुओं के परिवार से ग्रामानुग्राम विचरते हुवे हस्तीनापुर नगर के सहस्रवन उद्यान में यथोक्त अवग्रह याचकर संयम व तप से आत्मा को भावते हुवे विचरते थे || ३८ | उस समय में शृंगाटकाकार मार्ग में यावत् महान रस्ते पर ऐसा वार्तालाप होने लगा यावत् परिषदा पर्युपासना करने लगी. उस समय में | महाबल कुमारने ऐसा शब्द सुनकर जमाली की तरह कंचुकी पुरुषों को बोलाये और कंचुकी पुरुषों
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* प्रकाशक - राजबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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