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शब्दार्थ 4
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती ) सूत्र 438
दु० दुकुलवस्त्र सि० श्री हि. ही धि० धृति कि० कीर्ति बु० बुद्धि ल. लक्ष्मी नं० नंदादि भ भद्रासन त० तल त तालमें श्रेष्ट स सर्व र० रत्नामय नि०निजक व प्रधान भ० भवन केतु अ० आठ ध्वजा अ०आठव०वज ना० नाकट अ० अश्व स०सर्व ररत्नमय मिश्रीगृह प॰जैसे अ०आठ ह०हस्ती अ० आठ यान अ आठयुग ए. ऐसे सि० शिविका सं० संदामिनी गि० अबाडी थि० थिल्ली वि० विकटयान र रथ प०क्रीडा केलिये सिरीओ, अट्ठहिरीओ, एवंधिईओ, कित्तीओ, बुद्धीओ. लच्छीओ, अटुनंदाई, अट्ट भदाई, अट्ठतले तलप्पवरे, सव्वरयणामए, णियगवर भवणकेडे, अट्ठज्झए ज्झयप्पवरे, अट्ठवए, वयप्पवरे, ( दसगोसाहस्सिएणं वएणं) अटु नाडगाइं नाडगप्पवरे, बत्तीसं वद्धेणं नाडएणं, अट्ठआसे आसप्पवर, सव्वरयणामए सिरिघरपडिरूवए,
अट्टहत्थी हत्थिप्पवरे, सव्वरयणामए सिरिघरपडिरूबए, अट्ठजाणाइं जाणप्पवराई, आठ गोकुल, आठ बत्तीस प्रकार के नाटक करनेवाले, सर्व रत्नमय श्रीगृह को शोभानक ऐसे आठ श्रेष्ट अश्व आठ श्रेष्ठ हस्ती, आठ यान, आठ श्रेष्ठ युग, आठ शिविका, आठ संदामनी, आठ हस्ती की अंबाडी, आठ ऊंट की थिल्ली, आठ विकटयान, आठ क्रीडा करने के रथ, आठ संग्राम के रथ, आठ घोडे, आठ हाथी, आठ श्रेष्ठ ग्राम (दश हजार कुल का ग्राम) आठ दास, आठ दासियों, आठ किंकर, आठ कंचुकी आठ वर्षधार भंडारी, आठ हिसावी, आठ वणिक, आठ पोलिया, आठ सोने की सांकलवाले दीपक,
अग्यारना शतकका अग्यारवा उद्देशा.१४
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