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पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) सूत्र
दारगस्स नामगोएवि पहीणे भवइ णोचेवणं ते देश लोगंतं संपाउणंति ॥ तेसिणं भंते! देवाणं कि गए बहुए, अगए बहुए? गोयमा ! गए बहुए णोअगए बहुए गयाओं से अगए असंखेज्जइभागे, आगयाओसगए असंखजगुणे ॥ लोएणं गोयमा! ए महालए पण्णत्ते ॥ १९ ॥ अलोएणं भंते के महालए पण्णत्ते ? गोयमा! एएणं समयक्खेत्ते पणयालीसं जोअणसय सहस्साई आयामविक्खंभेणं जहा खंदए जाव परिक्खेवेणं ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं दसदेवा महिड्रिया तहेव जाव संपरिक्खि
त्ताणं चिटेजा ॥ अहेणं अट्ठदिसा कुमारी महत्तरियाओ अट्ठ बलिपिंडे गहाय माणुसु होजावे वहां तक भी वे देवों लोक का अंत प्राप्त करसके नहीं तब श्री गौतम स्वामी पूछन लगे कि अहो भगवन् ! क्या वे देवों बहुत क्षेत्र उल्लंघगये या बहुत क्षेत्र बाकी रहे ? अहा गौतम ! बहुत क्षेत्र उलंघगये परन्तु बहुत क्षेत्र बाकी नहीं रहे. गत क्षेत्र से अ क्षेत्र असंख्यात भाग वाला है। और अगत क्षेत्र से गत क्षेत्र असंख्यात गुना. अहो गौतम ! लोक इतना बडा कहा है. ॥ १९ ॥ अहो भगवन् ! अलोक कितना बडा कहा ? अहो गौतम ! यह अढाइ द्वीप पेंतालीस लाख योजन का लम्बा 3. चौडा कहा है वगैरह स्कंदक के अधिकार में कहा वैसे ही यावत् परिधि तक कहना. उस समय में दश महर्दिक यावत् चारों तरफ रहे हुवे हैं आठ दिशा कुमारियों आठ बलिपिंड लेकर मानुषोत्तर पर्वत की ।
भावार्थ
अग्यारवा शतक का दशवा उदेशा 48.