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________________ तिरियलोय खेत्तलोएणं भंते! किं जीवा एवंचेव एवं उढलोय खेत्तलोएवि, णवरं अरूवी छन्विहा अद्धा समओ नत्थि ॥ १२ ॥ लोएणं भंते! किं जीवा जहा बीयसए अस्थि उद्देसए लोगागासे, णवरं अरूवी सत्तविहा जाब अहम्मत्थिकायस्स परसा, जो आगासत्थि - क, आगासत्थि कायस्सदेसे, आगासत्थिकायस्स पएसा, अद्धासमए, सेसं तंत्र ॥ १३ ॥ अलोएणं भंते ! किं जीवा एवं जहा अत्थिकाय उद्देसए अलोगागासे तब णिरवसेसं जाव अनंत भागूणे ॥ १४ ॥ अहे लोय खेत्तलोयस्सणं भंते ! भावार्थ लोक में भी जीव, जीवदेश व जीव प्रदेश का बैले ही जानना और ऊर्ध लोक में भी वैसे ही कहना. ( परंतु इस में अरूपी अजीव छ कहना क्यों कि काल नहीं हैं ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! लोक में क्या { जीव है वगैरह जैसे दूसरे शतक में अस्तित्व उद्देशे में कहा वैसे ही यहां कहना इस में विशेषता इतनी कि यहां पर अरूपी के सात भेद ग्रहण करना. धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाय के देश व प्रदेश आकाशा{स्तिकाय के देश व प्रदेश और काल यो सात भेद हुवे || १३ || अहो भगवन् ! अलोकाकाश में क्या जीव है, जीव देश है जीव प्रदेश है अथवा अजीव है, अजीव देश हैं. अजीव गौतम ! जीव नहीं है यावत् अजीव प्रदेश भी नहीं है. परंतु एक अरूपी अगुरु लघु पर्यायवाला अनंत अगुरु लघु गुन सर्व आकाश रहा हुवा है || १४ || अहो भगवन् ! अधो लोक में एक आकाश प्रदेश पर प्रदेश है ? अहो सूत्र 4 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋषिजी ● प्रकाशक - राजा वहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी १५००
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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