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वित्थारओ अणेग विहिविहाणा, एवं जहा जीवाभिगमे जाव सयंभूरमण समुह पज. वसाणा, अस्सिं तिरियलोए असंखेजा दीवसमुद्दा पण्णत्ता समणाउसो! ॥ १८ ॥ अत्यण भंते ! जंबूद्दीवे दीवे दव्वाइं सवण्णाइंपि; अवणाइपि सगंधाइंपि अगंधाइंपि, सरसाइंपि अरसाइंपि, सफासाइंपि अफासाइंपि; अण्णमण्ण बढाई अण्णमण्ण पुढाई जाव घडत्ताए चिटुंति ? हंता अत्थि॥ अत्थिणं भंते ! लवणसमुद्दे दव्वाइं सवण्णाइंपि एवंचेव, एवं धायई खंडेदीवे एवंचेव ॥ एवं जाव सयंभूरमणे समुदे जाव हंता ।
अत्थि ॥ तएणं सा महइ महालिया महव्व परिसा समणस्स भगवओ महावीरस्स प्रकार हैं और विस्तार में एक २ से दुगुने हैं इस का विशेष कथन जीवाभिगम सूत्र से जानना यावत् ।
अंतिम स्वयंभूरमण समुद्र है इस प्रकार. तिळे लोक में असंख्यात द्वीप समुद्र हैं ॥ १८ ॥ विभंग अज्ञान से रूषी पदार्थ दीखते हैं इसलिये गौतम स्वामी प्रश्न करते हैं कि अहो भगवन् ! जम्बूद्वीप में क्या द्रव्य सवर्ण हैं या अवर्ण हैं गंधवाले हैं या गंध रहित हैं, रसवाले हैं या रस रहित हैं स्पर्शवाले हैं या
स्पर्श रहित हैं, परस्पर बंधे हुए या परस्पर स्पर्श हुवे यावत् परस्पर घटपना से रहे हुवे हैं ? हां गौतम ! १०७ ॐ वैसे ही सब रहे हुवे हैं. अहो भगवन् ! लवण समुद्र में क्या द्रव्य सवर्णवाले या वर्ण रहित वगैरह पूर्वोक्त 1 जैसे कहना. ऐसे ही घातकी खंड यावत् स्वयंभूरमण ममुद्र तक. कहना. फोर वहां जो बडी परिषदा
488 पंचांग विवाहपण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8.8%
4.3 अग्यारवा शत्रकका नववा उद्देशा 2848862