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________________ शब्दार्थ14140 * 14 पु० पुष्प फ० फलाहारी उ० ऊर्ध्व दंडी रु० वृक्षके मूल में बैठने वाले मं० मंडली वाले वि० बिलवासी 4 वल्कल पहिननेवाले दिदिशा में जल सींचकर आहार ग्रहण करनेवाले आ आतापना से पं०पंचअग्निताप से Vई० अग्नि सरिखा कं० कंदुसरिखा क• काष्ट सरिया जा० यावत् अ० आत्मा को क० करते वि. विचरते है त० तहां जे. जो दि० दिशोको जल सिंचकर ग्रहन करने वाले ता० तापस ते. उन की अं. पाम, 4 मुं० मुंड भ० होकर दिः दिशा प्रोक्ष्यक ता. तापसपने प० प्रवा अंगीकार करने को ५० प्रवा यंपिव, कंदुसोल्लियपिव, कटुसोलियंपिव, जाव अप्पाणं करेमाणा विहरंति ॥ तत्थणं जेते दिसापोक्खिय तावसातेसिं अंतियं मुंडे भवित्ता दिसापोक्खियतावसत्ताए पव्वइत्तए । पन्वइएवियणं समाणे अयमेयारूवं अभिग्गाहं अभिगिण्हेस्सामि ॥ कप्पइ मे जाब भावार्थ । ३५ किसीने डाल दिया अथवा बिगडगया हुवा कंद मूलादि खानेवाले, ३६ ऊंचा दंड रखकर सदैव रहने वाले ३७ वृक्ष की नीचे सदैव रहनेवाले ३८ मर्यादा बांधकर सदैव रहनेवाले ३१ बिलों में निवास करनेवाले ४० वल्कल पहिननेवाले ४१ चारों दिशा को पोषनेवाले ४२ सूर्य व अग्नि का ताप सहन करनेवाले १.४३ पंचाग्नि तपनेवाले ४४ आग्नि के ताप से तपकर कोयला जैसा शरीर करनेवाले ४५ अग्नि से हंडे समान *शरीर पचाने वाले, ४६ तपश्चर्या से शरीर शुष्क करके काष्ट भूत करने वाले वगैरह अनेक प्रकार के कष्टों } * सहन करने वाले तापस विचरते हैं ! इन में से दिशापोषी तापस की पास मंडित बनकर तापस पनाई | 48 पंचमाङ्ग विवाह पण्णारी (भगवत अग्गरवा शतक का नया उद्देशा है
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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