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________________ शब्दार्थ 488 488 पंचमांग विवाहपण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 88 एकदा पु० पूर्व र० रात्रि का काल में र० राज्यधुरा चि चितवते अ० इसरूप अ० चितवन जा० यावत् स० उत्पन्न हुवा अ० है मे० मेरे पु. पहिले के पो० पुराणे ज• जैसे ता तामली तापस जा यावत् है | पु• पुत्र से प० पशु से र० राज्य से र० रथ से व० बल से वा० वाहन से को० कोश को कोठार से पु० पुरसे अं० अंतःपुर से व• वृद्धिपाता हूं वि० विपुल घ० धन क कनक र० रत्न जा. यावत् सं० सत् सा० वस्तु से अ० अतीव अ० वृद्धिपाता हूं अ० मैं पु० पहिले के पो० पुराने जा० यावत् ए० एकान्त समयंसि रज्जधुरंचिंतेमाणस्स अयमेयारूवे अब्भत्थिए जाव समुप्पज्जित्था, आत्थि तामे पुरा पोराणाणं जहा तामलिस जाब पुत्तेहिं बड्ढामि, पसूहि बढाम, रज्जेणं वढामि, एवं-रहणं-बलेणं-वाहणेणं-कोसेणं-कोट्ठागारेणं-पुरेणं-अंतेउरेणं बड्डामि ॥ विपुलधण कणग रयण जाव संतसारसावदेजेणं अतीव २ आभिवढामि, तं किंणं अहं पुरा पोराणाणं जाव एगतसोक्खं उव्वेहमाणे विहरामि तं जाव ताव अहं हिरण्णेणं लुमार का कहा वैतेही जानना यावत् मुख भोगता हुवा विचर रहा है ॥ ५ ॥ एकदा शिव राजा को पूर्व | रात्रि में राज्य धूराकी चिंता करते हुवे ऐसा अंध्यवसाय उत्पन्न हुआ कि मेरे पूर्वकृत दान, पुण्य व तपई प्रभावसे यह ऋद्धि प्राप्त हुई है. जिस प्रकार तामली तापस का अधिकार कहा ऐसे ही इसका कहना यावत् मैं पुत्र, पशु, राज्य ऋद्धि स्थादि वाहनों, सेना, धनभंडार, कोष्टागार, ग्राम, नगर व अंतःपुर से । अग्यारवा शतकका नववा उद्देशा भावार्थ namoonamnnnn.
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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