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शब्दार्थ
श्री अमालक ऋषिजी .
सूत्र
क्य ए० एक जीव अ० अनेक जी० जीव गो० गौतम ए० एक जी. जीव णो नहीं अ० अनेक जी.. जीव ते० उस सिवा जे० जो अ० अन्य जी० जीव उ० उत्पन्न होते हैं ते० वे णो नहीं ए० एक जी० जीव अ० अनेक जीव ॥ १॥ सरल शब्दार्थ ॥
उप्पलेणं भंते! एगपत्तए किं एगजीवे अणेगजीवे ! गोयमा ? एगजीवे जो अणेगजीवे; तेणपरं जे अण्णे जीवा उववज्जति, तेणं णो एगजीवा अणेगजीवा ॥ १ ॥
तेणं भंते जीवा कओहिंतो उववजंति, किं णेरइएहितो उववजंति, तिरिक्खमणुदेवेहितो भावार्थ | १२० संज्ञा २१ कषाय २२ वेद २३ वेद बंध २४ संज्ञी असंज्ञी २५ इन्द्रिय २६ अनुबंध २७ संवेग).
२८ आहार २९ स्थिति द्वार ३० समुद्धात ३१ वेदना और ३२ उत्पात. उस काल उस समय में राज
नगरी के गणशील नामक उद्यान में श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को बंदना नमस्कार कर श्री मौतम स्वामी पूछने लगे कि, अहो भगवन् ! उत्पल कमल के एक पत्र में एक जीव है या अनेक जीव हैं ? अहो गौतम ! उत्पल कमल के एक पत्र में मूल एक ही जीव है परंतु अनेक जीव नहीं हैं और उस उपरांत उस जीव के अवयव रूप अन्य अनेक जीव उत्पन्न होते हैं उस आश्री अनेक जीव हैं परंतु एक जीव नहीं हैं ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! उत्पल कमल में नरक, तिर्यंच, मनुष्य व देव इन चारों गतिवाले में से कौनसी गतिताले जीव आकर उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! नरक के जीव उत्पल कमल में
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी.