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शब्दाथनीन प० मात विपिमान म. शतच. चार क. देवलोक में ए. अग्यारह उ. उत्तर हे. नीचे की
म. सात उ० उत्तर म० मध्यकी स० शत उ० उपर की पं० पांच अ० अनुत्तर विमान में ।। ३ ।। पु. पृथ्वी ठिस्थिति ओ. अबगाहना म० शरीर मं० मंघयण . मंठाण ले लेश्या दि० दृष्टि णा.
ज्ञान जो जोग उ० उपयोग द० दश स्थान इ० इस भं० भगवन् र० रलप्रभा पु. पृथ्वी के ती | एकारसुत्तरहेटिमए सत्तु त्तरंच माझमए ॥ सयमेयं उबरिमए ॥ पंचेश्य अणुत्तर
विमाणा ॥ ३ ॥ १ ॥ पुढवि लिइ ओगाहण सरीर संघयण मेव संठाणे ॥ लेस्सा
दिट्ठी णाणे, जागुवओगे य दसठाणा ॥ १ ॥ इमीसेणं भंते ! रयणप्पभाए पुढवीए । भावार्थ
च्युत इन दोनों में तोमो. नवोयक की प्रथम त्रिक में १११, दूसरी त्रिक में १०७, तीसरी त्रिक में १०० और उपर पांव अनुत्तर विमान के पांच सब मालकर ८४२७०२३ विमान हुवे ॥ ३ ॥ अब आगे उद्देशा के लीये द्वार गाशो बनाते हैं. १ स्थिति २ अगाहना ३ शरीर ४ संघयण मंठान ६ लेश्या १७ दृष्टि ८ ज्ञान ९ जोग १० उपयोग, इस में प्रथम स्थिति द्वार कहते हैं अहो भगवन् ! इस रत्नप्रभा नामक पृथ्वी में तीत लाव नरकापातमें से प्रत्येक नरकावास में नारकी के कितने स्थिति स्थान कहे हैं ? अहो गौतम ! प्रत्येक नरकावास में असंख्याते स्थिति स्थान कहे हैं क्यों की प्रथम पृथ्वी की अपक्षासे नारकी की जघन्य दश हजार वर्ष की स्थिति है. और एक २ समय बढाते उत्कृष्ट एक सागरोपम की
28°> पहिला शतकका पांचवा उद्देशा
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428 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती )