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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
42 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी
जो० ज्योतिषी वि० विमान वास स० शत सहस्त्र मो० सौधर्म में भं० भगवन् क० कितने वि० विमान वास स० शतसहस्र गो० गौतम ब० बत्तीस विमानवास सं० शतसहस्र ए० ऐसे ब० बत्तीस अ० भट्ठावीत बा० बारह अ० आठ च ० चार स० शतसहस्र प० पच्चास च० चालीस छ० छ स० सहस्र स० { सहस्रार में आ • आनत पा० प्राणत क० देवलोक च चार स० शत आ० आरण अ० अच्युत में ति० प० ॥ सोहम्मेणं भंते ! कइविमाणा वास सयसहस्सा पण्णत्ता ? गोयमा ! - बत्तीसं विमाणावास सयसहस्सा प० | एवं ( गाथा ) बत्तीसट्ठावीसा, बारस अट्ठ चउरो सयसहस्सा ॥ पण्णा चत्तालीसाछच्चसहस्सा सहस्सारे || १|| आणय पाणयकप्पे, चारि सारणच्चुए तिण्णि | सत्त विमाण सयाई, चउसुवि एएसु कप्पे ॥ २ ॥ अपू, तेऊ, वायु, वनस्पतिकायिक जीव द्वीन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चतुरेन्द्रिय तिर्येच पंचेन्द्रिय, मनुष्य, वाणव्यंतर व ज्योतिषी के असंख्यात स्थान कहे हैं. अहो भगवन् : सौधर्म देवलोक में कितने वास कहे हैं ? अहो गौतम ! सौधर्म देवलोक में बत्तीस लाख विमान वास कहे हैं. दूसरे ईशान देवलोक में अठ्ठावीस लाख विमान कहे हैं तीसरे सनत्कुमार में बारह लाख विमान कहे हैं, चौथे माहेन्द्र देवलोक में आठ लाख (पांचवे ब्रह्म देवलोक में चार लाख छड्डे लांतक में ५० हजार, सातवे महाशुक में ४० हजार, आठवे { सहसार में छ हजार नववे आणत दशत्रे प्राणत में इन दोनों देवलोक में चारमो अग्यारवे आरण चारबे
* प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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