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शब्दार्थ
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48 पंचमान विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 4088
+जिनके अस्थि स० निक्षिप्त चि० हैं जा. जो च० चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुर राजा के अः अन्य के
ब० बहुत अ. असुरकुमार दे० देव के दे० देवी के अ० अर्चनेयोग्य 40 वांदने योग्य ण. नमस्कार करने योग्य पू० पूजने योग्य स० सत्कार करने योग्य स० सन्मान करने योग्य क. कल्याणकारी मं० मंगलकारी चे. ज्ञानवंत १० पूजने योग्य भ० हैं ते. उनके प० प्रणिधान में णो० नहीं ५० समर्थ से वह ते इसलिये अ० आर्य ए. ऐसा बु० कहा जाता है णो० नहीं प० समर्थ च० चमर अ० असुरेन्द्र अ०
चमरस्स असुरिंदस्स असुरकुमाररण्णो अण्णेसिंच बहूर्ण असुरकुमाराणं देवाणय देवीणय अच्चणिजाओ वंदणिज्जाओ णमंसाणिज्जाओ पूयणिज्जाओ सक्कारणिज्जाओ सम्माणणिज्जाओ कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासणिज्जाओ भवति ॥ तेसिं पणिहाणे णो पभू से तेणटेणं अजो ! एवं वुच्चइ णो पभू चमरे असुरिंदे असुरराया
चमरचंचाए रायहाणीए जाब विहरित्तए ॥ पभूणं अज्जो चमरे अमुरिंदे असुरराया । वंदनीय, पूजनीय, नमस्कार योग्य, सत्कर्म योग्य, सन्मान योग्य, कल्याणकारी मंगलकारी देव समान
आत्मा समान व पर्युपासनीय होते हैं. उनको मनमें श्रेष्ट जानने से अहो आर्यो ! चमरेन्द्र चमरचंचा ७ राज्यधानी में सुधर्मा सभा में चमर नामक सिंहासन पर त्रुटित संख्याषाली देवियों की साथ भोग भोगने
को समर्थ नहीं है परंतु चमरेन्द्र चमरचंचा राज्यधानी की सुधर्मा सभामें चमर सिंहासन पर आरूढ होकर'
दशा शतक का पांचवा उद्देशा
भावार्थ