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________________ 6 शब्दाथ ते. उसकाल ते. उससमयमें रा• राजगृह १० नगरमें गु० गुणशील चे० उद्यान में जा. यावत् ५० परिषदा ५० पीछीगई ते. उसकाल ते• उससमय में स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर के ३० बहुत सकस्स णवरं चंपाए णयरीए जाव उववण्णा जप्पभिई चणं भंते ! ते चंपिच्चा तायत्तीसं सहाया सेसं तंचेव जाव अण्ण उववजंति ॥ ९ ॥ आत्थणं भंते ! सणंकुमारस्स देविंदस्स देवरण्णो पुच्छा ? हंता आधि ॥ से केण?णं जहा धरणस्स तहेव ॥ एवं जाव पाणयस्स ॥ एवं अच्चुयस्स जाव अण्णे उववजति ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ o दसमसयस्स चउत्थओ उद्देसो सम्मत्तो ॥ १० ॥ ४ ॥ *" तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नामं णयरे गुणसिलए चेइए जाव परिसापडिगया भावार्थ त्रिंशक क्या है ? अहो गौतम ! जैसे शक्रेन्द्र का कहा वैने ही. ईशानेन्द्र का जानना. मात्र इस में चंपा नगरी का अधिकार लेना. यावत् पहिले चवते हैं और अन्य उत्पन्न होते हैं ॥ ९ ॥ सनत्कुमार देवेन्द्र की पृच्छा. इस का अधिकार धरणेन्द्र जैसे कहना. ऐने ही यावत् माणत व अच्युत तक कहना. अहो भगवन् ! . आप के वचन सत्य हैं. यह दशवा शतक का चतुर्थ उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ १० ॥ ४ ॥ . 80 चौथे उद्देशे में देव की वक्तव्यता कही अब पांचवे उद्देशे में देवियों का कथन करते हैं. अहो भगवन् ! of राजगृही नंगरी के गुणशील नामक उछान में श्रमणः भगवंत महावीर स्वामी पधारे, परिषदा वंदन करने को । ङ्ग विवाहे. पण्णात्त ( भगवती ) सूत्र 480 80 दशवा शतक का पांचवा रद्दशा 0880 maanwrraman
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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