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सत्र
१४८३
(भगवती) सूत्र angr> पंचमांग बिवाह पण्णत्ति
तंचव, जाब णिच्चे अव्वोच्छिष्णिणयट्टयाए अण्णे चयंति अण्णे उववज्जति ॥ ५ ॥
अत्थिणं भंते ! धरणस्स णागकुमारिंदस्स णागकुमाररण्णो तायत्तीसगा देवा ? हंता आथि ॥ से केणटेणं जाव तायत्तीसगा देवा ? गोयमा ! धरणस्स णागकुमारिंदस्स णागकुमाररण्णो तायत्तीसगाणं सासए नामधेजे पण्णत्ते, जं नकदायि नासी जाव अण्णे चयंति अण्णे उववज्जति ॥ एवं भूयाणंदस्सवि, एवं जाव महाघो. सस्सवि ॥ ६ ॥ अत्थिणं भंते ! सक्कस्स दविंदस्स देवरण्णो पुच्छा ? हंता आत्थि ॥
से केणटेणं भंते ! जाव तायत्तीसगा देवा ? एवं खलु गोयमा ! तेणं कालेणं तेणं सब कहना ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! क्या धरणेन्द्रको त्रायत्रिंशक हैं ? हां गौतम ! धरणेन्द्रको प्रायत्रिंशक देव 4 रहते हैं. अहो भगवन् ! यह किस कारनसे कहते हो ? अहो गौतम! धरणेन्द्र के वात्रिंशक के नाम शाश्वत हैं. पहिले नहीं थे बैसा नहीं, नहीं है वैसा नहीं, नहीं होगा वैसा नहीं यावत् पहिले के चरते हैं और नये उत्पन्न होते हैं. ऐसे ही भूतानेन्द्र यावत् महाघोष के जानना ॥६॥ अहो भगवन् ! शकेन्द्रको क्या वायत्रंशक हैं? हाँ गौतम! है. अहो गवन् ! किस कारनसे ऐसा कहा गया है? अहो गौतम! उम काल उस समयमें इस जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें वालाक नामक सभिवेशं था. उसमें तेत्तीस गायापति श्रमणोषा
१-दशा शतक का चौथा उद्दशा 4.28
भावार्थ
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