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शब्दार्थ सहायक गा० गाथापति म श्रमणोपासक पु. पहिले उ० उग्र उ० उग्रविहारी सं ० संविग्न सं० संविन विहारी
भ० होकर न० पीछे पा० पार्श्वस्थ था पार्थस्थ विहारी ओशिथिल आ शिथिलाचारी कु• कुशील कु० ॥ ४. कुशीलाचारी अ० स्वच्छंदी अ० स्वच्छंदाचारी ब० बहुत वा० वर्ष स० श्रमणोपासक प० पर्याय पा• पालकर। स. उस म० स्थानको अ० विनाआलोचकर प० प्रतिक्ररणकर का० कालके अवसर में का० कालकरकेच
सहाया गाहावई समणोवासगा पुदि उग्गा उग्गविहारी, संविग्गा संविग्गविहारी भवित्ता, तओ पच्छा पासत्था पासत्थविहारी, ओसण्णा ओखण्णविहारी, कुसीला, कुसील विहारी, अहाच्छंदा अहाच्छंदविहारी, बहूई वासाई समणीवासग परियागं पारणंति २ त्ता अद्धमासियाए संलेहणाए अत्ताणं झूसंति २ ता तीसं भत्ताईअणसणाए छेदेति २ त्ता,
तस्सठाणस्स अणालोइय पडिकंता कालमासे कालं किच्चा चमरस्स असुरिंदरस असुररण्णो भावार्थ श्रावक पहिले उग्र, उग्र विहारी, संविम, प्रविन विहारी हो पीछे पार्श्वस्थ, पार्श्वस्थ विहारी,प्रमादी प्रमाद
विहारी, कुशील, कुशील बिहारी सच्छंदी स.च्छंदा । ब और बहुत वर्ष श्रणो सक पर्याय पालकर 150 पारह दिनकी संलेखनासे आत्माको झू कर तीस भक्त अनशनका छ किया. इतना अनशन किये पीछे की
उस स्थानकी आलोचना निंदा किये बिना कारके उसमें कालकर के अमर नामक असुरेन्द्रक त्राय-31
मांगविवाह पण्णचि (भगवती)-सूत्र
दशना शतकका चाचा उद्देशा