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________________ शब्दार्थ अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी + प.समर्थ ग० गातम वि० मोह से प० समर्थ भं० भगवन् कि क्या पु• पाहेले वि. मोह प्राप्तकर प० पीछे वी व्यतिक्रमे ५० पहिले वी० व्यतिक्रमे ५० पीछे वि० मोह प्राप्तकर गो गौतम पु. पहिले वि० मोहपामे अमुरकुमारस्स मझं मज्झेणं वाईवएज्जा ? णो इणढे समटे, एवं असुरकुमारेणवि तिणि आलावगा भाणियव्वा, जहा ओहिएणं देवेणं भाणिया, एवं जाव थणिय कुमारेणं, वाणमंतरजोइसिवेमाणिएणं एवंचव ॥ ४ ॥ अप्पिड्डीएणं भंते ! देवे भहिद्वियाए देवीए मझं मझेणं वीईवएज्जा ? जो इण? समढें ॥ समिड्डिएणं भंते ! देवे समिड्डियाए देवी मझंए मञ्झेणं एवं तहेव देवेणय देवीएय दंडओ भाणियन्यो जाव वैमाणिए आप्पिढियाण भंते ! देवी महिड्डियस्स देवस्स मज्झ मझेणं एवं एसोवि तइओ ____दंडओ भाणियव्यो, जाव महिड्डिया वेमाणिणी, अप्पिद्वियरस वेमाणियस्स मज्झं मझेणं या पाहिले जाकर पीछे विभ्रम उत्पन्न करता है ? अहो गौतम ! पहिले विभ्रम उत्पन्न कर जा सकता है। और गये पीछे भी विभ्रम उत्पन्न कर सकता है ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! क्या अल्प ऋद्धिवाला असुर कुमार महद्धिक असुर कुमार की बीच में ना सकता है ? अहो गौतम ! जैसे समुच्चय देव के तीन आलापक कहे वैसे ही अमुर कुमार का जानना. ऐसे ही स्थनित कुमार, वाणव्यंतर, ज्योतिषी व वैमानिक का जानना ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! अल्प ऋद्रियाला देव महद्धिक देवी की बीच में होकर जा सकता है ? - अहो गौतम ! नहीं जा सकता है. अहो भगवन् ! समऋद्धिवाला देव समऋद्धिवाली देवी बीच में होकर * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी घालाप्रसादजी* भावार्थ +
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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