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पण्णसि ( भगवती ) सूत्र
० भगवन दे देव स० समद्धिक दे० देव की म० मध्य से वी० व्यतीक्रमे णो नहीं इ. यह अर्थ . स. समर्थ प० प्रमादसें-वी. व्यतिक्रपे भं भगवन् किं. क्या वि० मोह में प० समर्थ अ० विना मोह से विमोहित्ता पच्छा वीईबएन्जा, णो पुब्बि बीईवयित्ता पच्छा विमोहिज्जा ॥ २ ॥ महिट्ठीएणं भंते ! देवे अप्पिढियस्स देवस्स मज्झं मझेण वीईवएजा ? हंता बीई. वएज्जा ॥ से भंते ! किं. विमोहित्ता अविमोहित्ता पभ ? गोयमा ! विमोहित्ता पभू अविमोहित्ता पभू ॥ से भंते ! किं पुब्धि विमोहित्ता पच्छा वाईवएज्जा, पुद्धि वीईवइत्ता पच्छा विमोहेजा ? गोयमा ! पुर्दिबवा विमोहित्ता पच्छा वीईवएजा, पुविवा
वीईवइत्ता पच्छा विमोहेजा ॥ ३ ॥ अप्पिट्ठीएणं भंते । असुरकुमार महिड्डियस्स परंतु विमोह उपनाये विना नहीं जा सकता है. अहो भगवन् ! देवता पहिले विमाह उपजाकर क्या जाता
विमोह उपजाता है? अहो गौतम! पाहल विमोह उत्पन्न करता है और पीछे जाता है। परंतु जाकर विमोह नहीं उपजा सकता है ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! महर्दिक देव अल्प ऋद्धिवाले देव की वीच में होकर क्या जा सकता है ? हां गौतम ! जा सकता है. अहो भगवन ! क्या वह विभ्रम उत्पन्न कर जा सकता है या विभ्रम उत्पन्न किये बिना सकता है? अहो गो .म. विभ्रम उत्पन्न किये बिना भी जा सकता है. यदि विभ्रम उत्पन्न कर जा सकता है तो क्या पहिले विभ्रम उत्पन्न कर प.छे जा सकता है
दशधा शतक का तीसरा उद्देशा
वाथे