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मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
चिल्ललग वेरेहिय पुढे ॥ पुरिसेणं भंते ! इसि हणमाणे किं इसिवरेणं पट्रे णो इसिवेरेणं पटै ? गोयमा ! णियम इसिवरेणय णो इसिवेरेहिय पुटे ॥ ६ ॥ पुढवीकाइयाणं भंते ! पुढवीकाइयं चेव आणमंतिवा पाणमंतिवा, ऊससंतिवा, . नीससंतिवा ? हंता गोयमा ! पुढवीकाइया पुढवीकाइयं चेव आणमंतिवा जाव
नीससंतिवा ॥ पुढवीकाइयाणे भंते ! आउकाइयं आणमंतिवा जाव नीससंतिवा ? हंता गोयमा ! पुढवीकाइयाणं आउकाइयं आणमंतिवा जाव नोससं
तिवा ॥ एवं तेऊकाइयवाउकाइयं, एवं वणस्सइकाइयं ॥ ७ ॥ आउकाइबहुत अन्य जीवों की घात हुई होवे तो बहुत नो पुरुष वैर से स्पर्शा यों तीन भांगे पाते हैं. ऐसे ही इस आश्री हस्ती यावत् चित्ता तक कहना ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! पुरुष ऋषि की घात करना हुवा क्या ऋषि के वैर स्पर्शा या नो ऋषि के वैर से स्पर्शा? अहो गौतम ? ऋषि के वैर से स्पर्शा और अन्य। अनंत जीवों को मारने से अनंत नो ऋषि वैर से स्पर्शा यों दो भांगे पाते हैं ॥ ६ ॥ मृत्यु श्वासोश्वाम पर है इसलिये श्वासोश्वास का प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! पृथ्वीकायिक जीव क्या पृथ्वी काया का श्वासोश्वास लेते हैं ? हां गौतम ! पृथ्वीकायिक जीव पृथ्वीकाया का श्वासोश्वाम लेते हैं. अहो भगवन् ! पृथ्वी कायिक क्या अप्काया का श्वासोश्वास लेते हैं ? हां गौतम ! पृथ्वी कायिक अप्काया का श्वासो
* प्रकाशक-राजाबहादर लालामुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*
भावार्थ
4.अनुवादक-बालब्रह्म