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शब्दार्थ
भामर में का० कालकर के ल० लंतक दे. देवलोक में जा. यावत् उ० उत्पन्न हुवा ॥ ९७ ॥ ज० जमाली भ० भगवन् दे० देवलोक से आ० आयुष्यक्षय से जा. यावत् क० कहां उ० उत्पन्न होगा गो० गौतम च० चार पं० पांच ति० तिर्यंच म० मनुष्य दे० देव भ० भवग्रहण सं० संसार अ० भ्रमणकर तक पीछे सि० सिझेगा जा० यावत् अं० अंत करेगा स. वह ए ऐसे भं० भगवन् ॥१॥३३॥
ठागस्स अणालोइयपडिक्ते कालमासे कालं किच्चा लंलए कप्पे जाव उववण्णे॥९॥ जमालीण भंते देवे ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं जाव कहिं उववजहिति? गोयमा! चत्तारिपंच तिरिक्ख जोणिय मणुस्स देव भवग्गहणाई संसारं अणुपरियहित्ता तओ पच्छा सिज्झिहिति जाव अंतं काहिति ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ जमाली सम्मत्तो ॥
नवमसयस्स तेत्तीसमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ९ ॥ ३३ ॥ भावार्थ किल्विषी देवपने उत्पन्न हवा ॥९७ ॥ अहो भगवन् ! जमाली वहां से आयष्य, स्थिति व भव क्षय होने
से कहां जावगा व कहां उत्पन्न होवेगा? अहो गौतम ! तिर्यंच मनुष्य व देव के चार पांच भव करके
पीछे सीझेगा, बुझेगा यावत् सब दुःखों का अंत करेगा. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं यह जमाली 15 का अधिकार पूर्ण हुवा, यह नववा शतक का तेत्तीसवा उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥९॥३३॥
* अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 8+
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादी *