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________________ शब्दार्थ | सूत्र भावार्थ +2 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी [सं० संसार कं० कंतार अ० भ्रमण करते हैं ॥ ९५ ॥ ज० जमाली भं० भगवन् अ० अनगार अ० अरस आहारी वि० विरस आहारी अं० अंत आहारी पं० प्रांत आहारी ल० रूक्ष आहरी तु० तुच्छआहारी अ० {अरम जीवी जा यावत् तु० तुच्छ जीवी उ० उपशांत जीवी प० प्रशांत जीवी वि० विविक्तजीवी हं० हां गो० गौतम ज० जमाली अ० अनगार अ० अरस आहारी जा० यात्रत् विविक्त जीवी ॥ ९६ ॥ ज० यदि १० भगवन् ज० जमाली अ० अनगार अ० अरस आहारी जा० यावत् वि० विविक्तजीवी क० कैसे भं० चाउरंत संसार कंतारं अणुपरियहंति॥ ९५॥ जमालीणं भंते! अणगारे अरसाहारे विरसाहारे अंताहारे पंताहारे लहाहारे तुच्छाहारे, अरस जीवी जाव तुच्छजीवी उवसंतजीवी पसंती M विवित्तजीवी? हंता गोयमा ! जमालीणं अणगारे अरसाहारे जाव विवित्तजीवी ॥ ९६ ॥ जइ भंते! जमाली अणगारे अरसाहारे जाव विवित्तजीवी कम्हाणं भंतेजमाली अनगारे कालमासे कालंकिच्चा लतएकप्पे तेरससागरोवमट्टिईएस देवकिव्विसिएसु देवसु देवत्ताए उबवण्णे ? संसार में परिभ्रमण करते हैं ॥ ९५ ॥ अहो भगवन् ! क्या जमाली अनगार अरस, विरस, अंत, प्रान्त, रूक्ष, तुच्छ आहार करनेवाला व अरम से उपजाविका करनेवाला यावत् तुच्छ से उपजीविका करनेवाला उपशांत जीवी, प्रशांत जीवी, व विविक्त जीवी था ? हां गौतम ! जमाली अनगार अरस आहार करनेवाला यावत् विविक्त जीवी था ॥ ९ ॥ जब जमाली अनगार अरस आहारी यावत् विविक्त जीवी था * प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * १४४४
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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