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शब्दार्थ 4 तेरह सा० सागरोपम की ठि० स्थिति में ॥९४ ॥३० देव कि० किल्विषी भ० भगवन् ता. उस दे ।
देवलोक से आ० आयुष्यक्षय से भ० भवक्षय से ठि० स्थितिक्षय से च० चवकर के० कहाँ ग० जाते हैं | एक कहां १० उत्पन्न होते हैं गो० गौतम जा. यावत् च० चार पं० पांच • नारकी ति० तिर्यंच म०
मनुष्य दे० देव भ० भवग्रहण सं० संसार अ० भ्रमण कर त० पीछे सि० मिझते हैं बु० बुझते हैं जा यावत् अं• अंत क० करते हैं अ० कितनेक अ० अनादि अ० अनंत दी. दीर्घ काल चा० चातुरंत है
ईएसुधा, तिसागरोवमट्टिईएसुवा, तेरस सागरोवमट्टिईएसुवा ॥ ९४ ॥ देवकिन्धिः सियाणं भंते ! ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं भवक्खएणे ठिइक्खएणं अणंतरं चयं चइत्ता कहिं गच्छंति कहिं उवयजंति ? गोयमा! जाव चत्तारि पंच णेरइय तिरिक्खजोगिय मणुस्स देव भवग्गहणाई संसारं अणुपरियट्टित्ता, तओ पच्छा
सिझंति बुझंति आव अंतं करेंति ॥ अत्थेगइया अणाइयं अणवदग्गं दीहमद्धं भावार्थ
में काल कर तीन पल्योपम, तीन सागरोपम व तेरह सांगरोपम की स्थितिवाले किल्विषी देव मे उत्पन्न होते हैं॥ १४ ॥ अहो भगवन् ! उम किलिपी देवलोक में से किलिषी देवों आयुष्य, स्थिति व भव क्षय होने से कहां उत्पन्न होते हैं ! अहो गौतम ! वहां से चार पांच नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देव भव करके पीछे सझते हैं बुझते हैं यावत् सब दुःखों का अंत करते हैं, और किसनेक अनादि अनंत चतुर्गति ।
पंचांग विवाह पण्णचि ( भगवती ) मूत्र
84.नववा शतक का तेत्तीमवा उद्देशा200