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________________ शब्दार्थ) सूत्र भावार्थ (ऐसा आ कहते को ए० यह अर्थ णो० नहीं स० श्रद्धे ए यह अर्थ अ० नहीं श्रद्धता दो० दूसरी वक्त (म० मेरी अं० पास से आ० आत्मा से अ० अपक्रमण कर ब० बहुत अ० अशुभभावना उ० उद्भवने से [ जा० यावत् दे० देव किल्विषपने उ० उत्पन्न हुवा ॥ ११ ॥ क० कितने प्रकार के भं० भगवन् दे० देवकिल्बिष गो० गौतम ति तीन प्रकार के ति०तीन पल्योपमकी टि० स्थितिवाले ति तीन सागरोपमकी 4 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र कुसिस्से जमाली णामं अणगारे सेणं तदा ममं एवमाइक्खमाणस्स ४ एयमटुं णो सद्दहइ ३ एयमट्टं असद्दहमाणे दोच्चंपि मम अंतियाओ आताए अवक्कमइ २ त्ता बहूहिं असम्भावुनावणार्हि तंचेच जाव देवकिव्विसियत्ताए उबवण्णे ॥ ९१ ॥ कइविहाणं भंते! देव किव्विसिया प० ? गोयमा ! तिविहा देवकिव्विसिया पण्णत्ता तंजहा तिपलिओचमट्टिईया, तिसा - {ने उत्तर दिया कि अहो गौतम ! मेरा अंतेवासी कुशिष्य जमाली नामक अनगार मेरे वचनों को नहीं श्रद्धता यावत् नहीं रुचि करता दूसरी बार भी मेरी पास से चला गया, और अशुभ अध्यवसाय से ( स्वत: को व अन्य को मिथ्यात्व में डालता हुवा यावत् काल के अवसर में काल करके किल्विषी में किल्विषी देवपने उत्पन्न हुवा है ॥ ९१ ॥ अहा भगवन् ! किल्विषी देव के कितने भेद कहे हैं ? अहो [गौतम ! किल्विषी देव के तीन भेद कहे हैं. तीन पल्योपम की स्थितिवाले, तीन सागरोपम की स्थिति 4 नववा शतकका तेत्तीसवा उद्देशा 48 १४३९
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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