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________________ शब्दार्थ 48 पंचमांगविवाह पण्णति (भगवती) सूत्र 498 कहते हैं जा. यावत् प० प्रभाते हैं च० चलते च० चला तं० तैसे स० सर्व जा० यावत् णि निर्जरते अ. अनिर्जरा ॥ ८२ ॥ त० तब तक उस ज. जमाली अ० अनगार को ए० ऐमा आ० कहते जा. यावत् प० प्ररूपते को अ० कितनेक स० श्रमण णि• निथ ए० इस अर्थ स० श्रद्ध प० प्रतीतकरे रो०० रुचे अ० कितनक स० श्रमण निः निग्रंथ ९० इस अर्थ को जो० नहीं स. श्रद्धे णो० नहीं। ५० प्रतीत करे णो नहीं गे० रुचे ॥ ८३ ॥ त० तहां जे. जो स० श्रमण नि० निग्रंथ ज० जमाली अ. णुप्पिया समणे भगवं महावीरे एवमाइक्खइ जाव परूवेइ. एवं खलु चलमाणे चलिए तंचेव सव्वं जाब णिजरिजमाणे आणिजिण्णे ॥ ८२ ॥तएणं तस्स जमालिस्स अणगारस एव माइक्खमाणस्स जाव परूवेमाणस्स अत्थेगइया समणा णिग्गंथा एयमटुं सद्दहति पत्तियंति रोयंति, अत्थेगइया समणा निग्गंथा एयमटुं णो सहहति णो पात्तेयंति णो रोयंति ॥८६॥ तत्थणं जेते समणा णिग्गंथा जमालिस्स अणगारस्स ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं कि चलते हुवे चले यावत् निर्जरते हुवे निर्जरे, यह मिथ्या है; परंतु चलतेहुवे 90 नहीं चले यावत् निर्जरत हुवे नहीं निर्जरे ऐमा कहना ॥ ८२ ॥ उस समय में ऐसे कहने हुवे यावत् प्ररूपते । हुवे जमाली अन गार के वचन की कितनेक श्रमण निग्रंथने श्रद्धा प्रतीति व रुचि की और कितनेक श्रमण २० निग्रंथने श्रद्धा प्रतीति व रुचि नहीं की ॥ ८३ ॥ उन में से जिन श्रमण निग्रंथने जमाली अनगार के ऐसे १५ 22 438 नवां शतकका तेत्तीसवा उद्देशा भावार्थ
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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