________________
शब्दार्थ उज्वल ति. त्रितुल ५० प्रगाढ क० कर्कश क० कटुक चं० चंड दु० दुःख दु विषम ति तीव्र दु. दुःसह.
पि० पित्त ज. ज्वर ५० हुआ स० शरीर में दा० दाह उ० उत्पन्न हुवा वि० विचरनेलगे ॥ ७८ ॥ त. तब से वह ज. जमाली अ० अनगार वेदना से अ० पगभव दुवा स० श्रमण नि० निथ को स. बोलाकर एक ऐसा व वोला तु० तुम दे देवानुप्रिय म मेरी से० शय्या सं. बीछावो । ७१ ॥
त. तब से वे स० श्रमण नि० निथ ज. जमाली अ० अनगार का ए० यह अर्थ वि. विनय से प०१ - है सूनकर जा जमाली अ० अनगार की से० शय्या सं० वीछावे ॥ ८० ॥ त० तब से वह ज• जमाली
सरीरगंसि विउलरोमातके पाउन्भृए, उज्जले तिउले पगाढे ककसे कडुए चंडे दुक्ख । दुग्गे तिब्वे दुरहियासे पित्तज्जरपरिगयसरीरे दाहवुक्कतिएयावि विहरइ ॥ ७८ ॥ तएणंसे जमाली अणगारे वेदणाए अभिभूए समाणे समणे निग्गंथे सदावइ २त्ता. एवं वयासी तुझणं देवाणुप्पिया ! ममं सेज्जासंथारयं संथरह ॥ ७९ ॥ तएणं तेसमणा निग्गंथा जमालिस्स अणगारस्स एयमटुं विणएणं पडिसुणेति २ त्ता जमालिस्स
अणगारस्स सेजासंथारगं संथरेंति ॥ ८. ॥ तएणं से जमाली अणगारे बलियतरं भावार्थ दाह उत्पन्न होने लगी ।। ७८ ॥ वेदना से पीडिन होने से जमाली कुमारने श्रमण नियों को बोलाये
1 और कहा कि अहो देवानुमिय ! मेरा संथारा विछावो ॥ ७९ ॥ उस समय में श्रमण निग्रंथ जमाली,
48 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
* प्रकाशक-राजाबहादुर लालामुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*