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शब्दार्थ णो० नहीं आ० आदर करे जा. यावत् तु० मौन चि० रहे त. तब से वह ज० जमाली अ• अन
र स० श्रमण भ. भगवन्त म० महावीरको वं. वंदनकर न. नमस्कार कर स० श्रमण भ. भगवन्त म० महावीर की अंक पास से ब. बहशाल चे० चैत्य से १० नीकलकर पं० पांच अ० अनगार स० शत स०है साथ ब. बाहिर ज. अन्यदेश में वि० विहार वि०विचरनेलगे ॥७॥ ते. उस काल ते. उस समय में सा० श्रावस्ती न० नगरी हो० थी को० कोष्टक चेः चैत्य व वर्णन युक्त जा. यावत् व० वनखंड ते उस
काल ते. उस समय में चं० चंपा न० नगरी हो० थी व० वर्णन युक्त पु. पूर्णभद्र चे० चैत्य ५० वर्णन टभगवं महावीरं बंदइ नमसइ वंदित्ता नमंसित्ता समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिहै याओ बहुसालाओ चेइयाओ पडिणिक्खमइ २ ता पंचहि अणगारसएहिं सद्धिं । ई बहिया जणवयविहारं विहग्इ ॥ ७४ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं सावत्थी णाम
णयरी होत्था वण्णओ कोटुए चेइए वण्णओ जाव वणसंडस्स तेणं कालेणं तेणं समएणं भावार्थ इच्छता हूं. श्रमण भगवंत महावीर स्वामीने दो वार तीनवार भी इस अर्थ का आदर किया नहीं यावत्
मौन रहे. इस से श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को जमाली वंदना नमस्कार करके बहुशाल चैत्य में से नीकलकर पांच सो अनगार की साथ जनपद विहार विचरने लगे ॥ ७४ ॥ उस काल उस समय में श्रावस्ती नामक नगरी थी. वह वर्णन योग्य थी उसमें कोष्टक नामक उद्यान यावत् वनखंड था. उम है ।
पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र व
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नववा शतकका तेत्तीमत्रा उद्देशान