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शब्दार्थ देवानुत्रिय सं० संसार म० भय उ० उद्विग्न भी० डराहुवा ज० जन्म ज० जरा म० मरण से इ० इच्छता {है दे० देवानुप्रिय की अं० पास मुं० मुंड भ० होकर अ० अगार से अ० अनगार को प० प्रवर्ज्या अंगीकार करने को तं इसलिये दे० देवानुप्रिय को अ० हम सी शिष्य भिक्षा द० देते हैं पर लो (दे० देवानुप्रिय सी. शीष्यभिक्षा अ० यथासुखम् दे देवानुप्रिय मा० मत प० प्रतिबंध ॥ ७१ ॥ त० तत्र { से ० वह ज० जमाली ख० क्षत्रिय कुमार सश्रमण भ० भगवन्त म० महावीर से ए० ऐसा वु० बोलाये हुवे एसणं देवाणुप्पिया! संसार भयउव्विग्गे भीए जम्मजरा मरणेणं इच्छइ देवाणुप्पियाणं अंतिए मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइत्तए । तं एसणं देवाणुप्पियाणं अम्हे सीसभिक्खं दलयामो पाडच्छंतुणं देवाणुप्पिया ! सीसभिक्खं ! अहासुहं देवाणुप्पिया ! मापडिबंधं ॥ ७१ ॥ तएणं से जमाली खत्तियकुमारे समणेणं भगवया महावीरेणं एवं वृत्ते समाणे तुट्ठे समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो जाव णमंसित्ता उत्तर { जम्प जरा मरण से डरा हुआ है इस से आप की पास मुंडित बनकर गृहवास से दीक्षा अंगीकार करने को चाहता है. हम आप को यह शिष्य भिक्षादेते हैं.. अहो देवानुप्रिय ! तुमको जैसे सुख होवे वैसे करो विलम्ब मतकरो ऐसा भगवंत बोले ॥ ७१ ॥ जत्र श्रमण भगवंत श्रीमहावीर स्वामीने ऐसा कहावत्र जमाली क्षत्रिय कुमार दृष्ट यावत् आनंदित हुए और श्रमण भगवंत श्री महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार करके ईशान कौन
सूत्र
भावार्थ
48 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
* प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहाबजी ज्वालामसादगी *
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