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शब्दार्थ
सूत्र
भावार्थ
4:- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 4
ज० जमाली ख० क्षत्रियं कुमार अ० हम को ए० एक पु० पुत्र इ० इष्ट के कति जा० यावत् किं० क्या पा० देखनेसे से० वह ज० जैसे उ० उत्पल प० पद्म जा०यावत् स० सहस्र पत्र पं० पंक "जा० उत्पन्न हुबा जजल में सं० वृद्धि पाया गो० नहीं अ० लीप्त होवे पं० पंकरजसे णो० नहीं अ० लीस होवे ज० { जलरज से ए० ऐसे ही ज० जमाली ख० क्षत्रिय कुमार का काम से जा० उत्पन्न हुवा भो० भोगने सं० वृद्धिपाया णो० नहीं अ० लीप्त होवे का? काम रज में णो० नहीं अ० लीप्त होवे भो० भोगरज में गो० नहीं अ० लीप्त होवे मि० मित्र णा० ज्ञाति णि० निजके स० स्वजन सं० संबंधी प० परिजन से दे० तिक्खुतो जाव णमंसित्ता एवं वयासी एवं खलु भंते । जमाली खत्तियकुमार अम्हं एगे पुट्ठे कंते जात्र किमंगपुणे पासणयाए से जहाँ नाभए उप्पलेइवा पउमेदवा आव सहरसपत्तइवा पंके जाएं जले संबुड्ढे गोवलिप्पइ पंकरएणं णोवलिप्पइ जलरएणं एवामेव जमालीवित्तियकुमारे कामेहिं जाए भोगेहिं संबुड्ढे गोवलिप्पइ कामरएणं पोलिप्पड़, भोगरएणं, णोवलिप्पइ मित्तणाइ णियग सयण संबंधि परिजणेणं उत्पन्न होता है जल में वृद्धिपाता है, परंतु उस से लिप्त नहीं होकर वृद्धिपाता है ऐसे ही यह जमाली कुमार कामते व जन्मा भोग से वृद्धिपाया है परंतु कामभोग में लिप्त नहीं हुआ है वैसे ही मित्र ज्ञाति स्वजन संबंधिं व परिजन से लिप्त नहीं बना हुआ है. अहो देवशनुप्रिय ! यह संसार भय से उद्विग्न बना हुआ
8 नवत्रा शतक का तेत्तीसवा उद्देशा 34403
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