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शब्दार्थ140
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* यावत् अ० अवलोकन करते ज० जय २० शब्द ५० बोलते अ• यथानुपूर्वी सं० चलनेलगे ॥ ६३ ॥
त० पछि ब० बहुत उ० उग्र भो भोग ज. जैसे उ० उववाइ में जा. यावत् म० महान् पुरुष व०वृन्द मे १५० घराय हुवे ज० जमाली ख० क्षत्रिय कुमार की पु० आगे म० मार्ग में पा. बाजु में अ० यथानुपूर्वी स° चलनलग ॥६४॥ त तब ज. जमाली ख० क्षत्रिय कुमार का पि पिता हा० स्नान किया जा यावत् वि० विभाषित ह. हस्तिपे बैठे हवे स. कोरंटक की म. माला का छ० छत्र ध० धरता से० श्वेत
करमाणा जय २ सदंवा पउंजमाणा पुरओ अहाणुपुवीए संघट्टिया ॥ ६३ ॥ तयाणतरंचणं बहवे उग्गा भोगा जहा उववाइए जाव महा पुरिस वग्गुरापरिक्खित्ता । जमालिस्ट्स खत्तियकुमारस्स पुग्ओ मग्गओय पासओय अहाणुपुव्वीए संपट्टिया
॥६॥ तएणं जमालिस्स खत्तियकुमारस्स पिया व्हाया कय जाब विभासिए हत्थिखं
है धवरगए सकोरंटमल्लुदामेणं छत्तेणं धरिजमाणेणं सेयवरचमाराहि, उडुबमाणाहिं २ भावार्थ हुई विजय पताका आगे रखी वगैरह जैसे उववाइ में यावत् देखते हुवे नेय जय शब्द करते हुवे अनुक्रम
सहित और सब व्यवस्था करने में आई ॥ ६३ ॥ तदनंतर बहुत उग्र कुल के उत्पन्न, भोग कुल के उत्पन्न
यावत् जैसे उववाद में कहा वैसे यावत् महा पुरुषों के वृंद भागे, पीछे दोनों बाजु यों चारों तरफ चले.. 1 ॥ ६४ ॥ फीर जमाली कुमार के पिताने स्नान किया यावत् विभूषित होकर - हस्ती के स्कंध पर बैठे.
103 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी,
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प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदव सहायजी ज्वालाप्रसादजी.