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शब्दार्थकोगले किये पा. तिलमतादि किया जा. यावत् ए० एक आभरण २० वस्त्र ग. ग्रहे हुवे नि महचारी
-जे. जहां ज. जमाली ख० क्षत्रिय कुमार का पि.पिता ते. तहां उ० आकर क० करतल जा० यावत् है
व वधाकर एक ऐसा व० बोले सं० बतायो दे. देवानुप्रिय जं. जो अ• हम से क० करने योग्य ॥६१॥ त० तब से वह ज० जमाली ख० क्षत्रिय कुपार का पि. पिता. तं० उन को कौटुम्बिक व वरतरुण स. सहस्र को ए. ऐसा व० बोला तु तुम दे० देवानुप्रिय हा० स्नान किये जा. यावन् ग० ग्रहित णि सहचारी ज• जमाली ख० क्षत्रिय कुमार की सी० शिविका प० उठावो त० तब ते० वे को
बसणगहिय निजोया जेणेव जमालिस्स खत्तियकुमारस्स पिया तेणेव उवागच्छइ २ प्ता करयल जाव बहावेइ २ त्ता एवं वयासी संदिसंतु णं देवाणुप्पिया ! जं अम्हेहिं कराणजं ॥ ६१ ॥ तएणं से जमालिस खात्तयकुमारस्स पिया तं कोडुबियं वरतरुणसहस्संपि एवं वयासी तुज्झेणं देवाणुप्पिया ! हाया कय जाव गहियाण
जोगा जमालिस्स खत्तियकुमारस्स सीयं परिवहेह तएणं ते कोडुंबिय पुरिसा जमाकर जमाली क्षत्रिय कुमार के पिता की पास गये. 'जय हो विजय हो' ऐसे शब्दों से बंधाये
और बोले कि अहो देवानुमिय ! हमारे योग्य जो काम होवे सो हम को बतलावो ॥ ६१ ॥ तत्र जमाली, * कुमारके पिता बोल कि अहो देवानुप्रिय ! तुमने लान किया है यावत् तुम शिविका उठाने योग्य हो ?
नुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी से
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ