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शब्दार्थको से० श्वेत पी० पीले क० कलशों से हा मान कराकर ५० पद्मवत् सु· सुवाले मु० सुरभि गं गंध *
का०लाल वस्त्र से गा. गांव लू० पूछकर स० श्रेष्ठ गो० गोशीर्ष चंदन में गा० गात्रों को अ० लेपकर णा० नाशिका णि निश्वास वो० बाह्य च० चक्षु को आनंद दायक व० वर्ण फ० स्पर्श सं० युक्त ह० अश्वकी म ला. लाली से से पे० मृदु अ० अतिशय ३० श्वेत क० कनक ख० मंडित अं० अंदर का कार्य म० बहुन ? महेंगा ई० हंशसरिखे प० सफेद वस्त्र प० पहिनाकर हा० हार ५० पहिनाकर ए. ऐसा ज. जैसे मू० सूर्याभ के अं० अलंकार त० तैसे चि० चित्र र० रत्न सं० जडित मु० मुकुट पि० पहिनाकर किं० क्या
सेयपीएहिं कलसेहिं व्हावेति २त्ता पम्हलसुकुमालाए सुरभिएणं गंधकासाइएणं गायाई
लूहति २ ता, सरसेणं गोसीसचंदणेणं गायाइं अणुलिंपंति २ ता णासाणिस्साहै सवाझं चक्खुहरं वण्णफरिससंजुत्तं हयलालापेलवातिरेगं धवलकणगखचितंतकम्मं ।
महरिहं हंसलक्खणपडसाडगं परिहिइ २ त्ता, हारं पिणडेति २ त्ता अद्धहारं
पिणāति, २ त्ता, एवं जहा सरियाभस्स अलंकारो तहेव, चित्तरयणसंकडुक्कडं । भावार्थ गोशीर्ष चंदन से गात्र में विलेपन किया, नाक के श्वासोश्वास से उडे ऐसे, आंखोंको आनंददायक, घोडा
की लालसे सुकोमल, अतिशय श्वेत, सुवर्ण मण्डित पल्लववाले, हंश से अधिक उज्वल ऐसे वस्त्र पहिनाये. पहिना कर आठारासरा पूर्ण हार, नवप्सरा आधा हार, वगैरह जैसे रायप्रसेणी सूत्र में सूर्याभदेवता ।
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
* प्रकाशक-राजाबहादर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*