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शब्दार्थ कश्यक में जा. यावत् स० सर्व दु० दुःख का अं० अंत करे ए. एकान्त दृष्टिवाला खु० घर जैसे ए. एकांत .
धारवाला लो लोहमय जजव चा चावना वा०रेत का कवल जैसे निक निस्तार गंगंगा म०-वडी नदी का १५० प्रतिश्रोत में जाना म० महा ममद्र जैसे भु. भुजासे द. दुस्तर तितिक्ष्णखङ्ग क. चलना गु० महा-3T शिला को लं• उठाना अ० असिधारा जसे व० व्रत च. आचरना णो० नहीं क. कल्पता है जा० पुत्र ___ जहा आवस्सए जाव सव्व दुक्खाणमंतं करेइ, अहीव एगंतदिट्ठिए, खरोइव एगंत ।
धाराए, लोहमया जवा चावेयव्वा, वालुया कवलेइव निस्सारे, गंगावा महानदी पडिसोत गमणयाए, महासमुद्दोव्व भुयाहि दुत्तरो, तिक्खं कमियव्यं, गुरुयं लंवेयव्वं,
आसिधारागं वय चरियव्वं, णो खलु कप्पइ जाया ! समणाणं णिग्गंथाणं आहाकभावार्थ सब दुःखों के अंत करनेवाले हैं परंतु जैसे भक्ष ग्राण करनेमें सर्प एकान्त दृष्टिवाला होता है वैसे ही उन के में
वचन हैं. क्षुर की धार समान तीक्ष्ण, लोहमय व चावने जैसे, बालु के कवल जैसे निस्तार, और गंगा . महा नदी के प्रातेश्रोत को जाने जैसे दुर्गमन हैं, महा समुद्र भुना से तीरने जैसे दुसाध्य हैं, तीक्ष्ण =
खड्ग धार पर चलने जैसे विषम हैं, महाशीला को हाथ में उठाकर रखने जैसे दुर्धर हैं, तरवार की धारा 3 जैसे नियमित सेवन करना दुष्कर हैं. क्यों किं श्रमण निग्रंथोंको आधाकर्मी, उद्देशिक, मीश्र, उज्झ यर
[साधु आये जान अधिक बनावे ] पूतिकर्म, मोललीया हुवा, उधार लीया, निर्बल की पास से छीना हुवा,
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र <2280
2020 नववा शतक का तेत्तीसवा
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