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दार्थ
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अनुवादकबालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी ६
महावीर को ति तीन वक्त जा. यावत् ण• नमस्कार कर चा० चार घंटवाला आ० अश्वस्य को दु० चढकर स० श्रमण भ० भगवन्न म. महावीर की अं० पाम से ब०बहुशाल चे चैत्य से प० नीकलकर स. कोरंटक कम० पुष्पको माला वाला जा० यावत् ध० धारण करते म० महान् भ० श्ट च. सुभट जा. यावत् १०घेराये हुवे जे. जहां ख. क्षत्रिय कुंडग्राम नगर ते० सहां उ. आकर ख० क्षत्रिय कुंडग्राम ण नगर की म०मध्य से जे. जहां स० स्वतःके गे गृह जे० जहां बाहिर की उ० उपस्थान शाला ते
णमंसित्ता, तमेव चाउग्धंट आसरहं दुरूहइ २ त्ता समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतियाओ बहुसालाओ चेइयाओ पडिणिक्खमइ २ त्ता सकारटमलदाभेणं जाव धरिजमाणेणं महया भड चडगर जाव परिक्खित्ते जेणेव खत्तिय कुंडग्गामे णयरे तेणेव उवागच्छइ २ ता खत्तियकुंडग्गामं णयरं मझं मझणं जेणेव सए गिहे
जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला तेणेव उवागच्छइ २ त्ता तुरिए णिगिण्हइ २ सा. स्वामी के ऐसे वचन श्रवण कर जमाली क्षत्रिय कुमार हृष्ट तुष्ट यावत् अती व आनंदीत हुए और श्रमण भगवंत श्री महावीर स्वामी को तीन आदान प्रदक्षिणा व नमस्कार करके चार घंटवाला रथरे आरूढ हुवं. और श्रमण भगवंत श्री महावीर स्वामी की पास से बहुशाल चैत्य से नीकलकर कोरंटक वृक्ष के पुष्पों की माला युक्त छत्र धारन करके यावत् बडे भट नोकर वगैरह से परवरे हुवे क्षत्रिय कुंड नगर तरफ जाने को
* प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ
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