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शब्दार्थ
488 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति ( भगवती । मत्र <aggi
व० बोले खि. शीघ्र भो० भो दे० देवानुप्रिय चा० चारघंट वाला अ अश्वरथ जु० युक्त उ० तैयारकरके म. मेरी आ० आज्ञा प० पीछी दो ता तब ते वे को. कौटुम्बिक पुरुप ज जमाली से ए. ऐसा बोलाये जा. यावत् प० पीछीदेवे ॥ २५ ॥ त० तब से वह ज० जमाली ख० क्षत्रिय पुत्र जे. जहां म० स्नानगृह ने तहां उ० आकर हा० स्नानकिया क० बलिकर्म किया ज० जैसे उ० उववाइ में ५० परिषदा व० वर्णन युक्त तक तैसे भा० कहना जा. यावत् चं० चंदन से खि० लिप्त गा• गात्र सशरीर वाले स० सर्व अलंकार वि० विभूषित म० स्नानगृह से प० नीकलकर जे० जहां वा. बाहिर की उ०
जुत्तामेव उवट्ठवेह उबट्टवेइत्ता, ममएय माणत्तियं पञ्चप्पिणह ॥ तएणं ते कोडंचिय पुरिसा जमालिणा खत्तियकुमारेणं एवं वुत्ता समाणा जाव पच्चप्पिणंति ॥ २४ ॥ तएणं से जमाली खत्तियकुमारे जेणेव मजणघरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता, ण्हाए कयबलिकम्मे जहा उववाइए परिसा वण्णओ तहा भाणियव्वं जाव चंदणी
क्खित्तगायसरीरे सव्वालंकारविभूसिए मजणघराओ पडिणिक्खमइ २त्ता, जेणेव बाहिनुप्रिय ! चार घंटवाला अश्वस्थ तैयार करो और मुझे मेरी आज्ञा पीछी दे दो. तब कौटुम्बिक पुरुषोंने ॐ ऐसी आज्ञा सुनकर हृष्ट तुष्ट हवे. यावत् चार घण्टवाला रथ तैयार करके उन को उन की आज्ञा पीछी दे दी ॥ २४ ॥ फीर जमाली. क्षत्रियकुमारः मज्जन गृह में गये. वहां स्नान किया, कोगले किये, वगैरह ।
48 नववा शतक का तेत्तीसवा उद्देशा
भावार्थ.
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