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शब्दार्थ
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* अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋाजी
णि अवधारकर ह. हृष्ट तुतुष्ट उ० स्थान से उ० उठकर म० श्रमण भ. भगवन्त म०महावीर को ति. तीन वक्त जा. यावत् ण. नमस्कार कर एक ऐसा व० बोला ए. यह एक ऐसे त० तथैव भं० भगवन् । ज• जैसे खं० स्कंदक जा. यावत् से० वह ज० जैसे तु० तुम व० कहतेहो उ० उत्तर पूर्व दि० दिशा में अ० जाकर स० स्वयं आ०आभरण म०माला अ०अलंकार उ० उतारकर स०स्वयं पं०पंचमुष्टि लो०लोच क० करके जे० जहां स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर ते. तहां उ० आकर स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को ति० तीनवक्त आ० आदान प० प्रदक्षिणा जा. यावत् १० नमस्कार कर ए. ऐसा
तिक्खुत्तो जाव णमंसित्ता एवं वयासी एवमेयं भंते ! तहमेयं भंते ! जहा खंदओ जाव से जहेयं तुम्भे वदह त्तिकटु उत्तर पुरच्छिमं दिसीभागं अवक्कमइ २त्ता सयमेव आभरण मल्लालंकारं उमुयइ २ त्ता सयमेव पंचमुट्टियं लोयं करेइ २ ता जेणेव
समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ २ त्ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो तुष्ट यावत् संतुष्ट हुवा और अपने स्थान से उठकर श्रमण भगवंत श्री महावीर स्वामी को तीनवक्त आदान प्रदक्षिणा यावत् नमस्कार करके ऐसा बोला कि अहो भगवन् ! यह वही है यह तथ्य है जैसे स्कंदकने कहा वैसेही यावत् तुम कहते हो वैसेही है ऐमा कहकर ईशान कौन में गया और सब आभरण अलंकार, माला वगैरह उतारकर स्वतःने पंच मुष्टि लोच किया, और फीर श्रमण भगवंत श्री महावीर स्वामी की पास
.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी.