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________________ शब्दार्थ यावत् १०. पर्युपासना करे इ. इस भ० भव में ५० परभव में हि० हित मु. सुख ख० क्षमा अ० अनुगामिक भ० होगा ॥ ४॥ त तब सा० वह दे. देवानंदा ब्राह्मणी उ० ऋषभदत्त मा. ब्राह्मण से बु० बोलाइ ह० हृष्ट जा. यावत् हि. आनंदित हइ क. करतल जा. यावत् क० करके उ० ऋषभदत्त में ब्राह्मण का ए. यह अर्थ वि० विनय से प० सुने ॥५॥ त० तब से वह उ० ऋषभदत्त मा० ब्राह्मण को कौटुम्बिक पु. पुरुष को स० बोलाकर एक ऐसा व० बोले खि० शीघ्र दे० देवानुपिय ल. लघुकर्ण १३३८ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी। पज्जुवासामो,एयं णो इह भवे परभवेय हियाए सुहाए खमाए आणुगामियत्ताए भविस्सा । तएणं सा देवाणंदा माहणी उसभदत्तेणं माहणेणं एवं बुत्तासमाणी हट्ठ जाव हियया करयल जाव कटु, उसभदत्तस्स माहणस्स एयमटुं विणएणं पडिसुणेइ ॥ ५ ॥ तएणं से उसभदत्ते भाहणे कोडंबिय पुरिसे सद्दावेइ सद्दावेइत्ता, एवं वयासी-खिप्पामेव भो उन को बंदन, नमस्कार यावत् पर्युपासना करे. यह इस भव व परभव को सुख, हित, कल्याण व अनगामी होगा ॥ ४ ॥ ऋषभदत्त से ऐसी बात सुनकर वह देवानंदा हृष्ट तुष्ट यावत् आनंदित हुई. और हस्तद्वय जोडकर ऋषभदत्त ब्राह्मण से इस अर्थ को सुना ॥ ५॥ फीर ऋषभदत्त ब्राह्मणने कौटुम्धिक पुरुष को बोलाये और ऐसा कहा कि अहो देवानमिय! शीघ्र क्रिया में दक्ष, प्रशस्त योगवन्त, समान खुर व * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी* भावार्थ
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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