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________________ १२ १३२७ भावार्थ 42 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 4.98 उव्वदृति असओ णेरइया उव्वटंति ? गंगेया ! सओ णेरइया उव्वटंति णो असओ णेरइया उन्वति एवं जाव वेमाणिया, णवरं जोइसिय वेमाणिएसु चयंति भाणियन्वं सओ भंते ! णेरइया उववजंति असओ णेरइया उववज्जति सओ असुरकुमारा उववनंति एवं जाव सओ वेमाणिया उववजंति, असओ वेमाणिया उववजंति, है सओ णेरइया उव्वटुंति, असओ गेरइया उव्वटंति, सओ असुरकुमारा उव्वति जाव सओ वेमाणिया चयंति असओ बेमाणिया चयति ? गगेया ! निरंतर उद्वर्तते हैं शेष सब अंतर सहित उद्वर्तते हैं और निरंतर उद्वर्तते हैं. मात्र ज्योतिषी व वैमानिक में सांतर व निरंतर चवने का आलापक कहा ॥ २८ ॥ अहो. भगवन् ! क्या छता नारर्क उत्पन्न होवे या अंछता नारकी उत्पन्न होवे ? अहो गागेय ! छता नारकी उत्पन्न होवे परंतु अछता नारकी उत्पन्न होवे नहीं. अहो भगवन् ! छता नारकी उर्तते हैं अछता नारकी उर्तते हैं ? अहो गांगय ! छता नारकी उद्वर्तते हैं अछता नारकी नहीं उर्तते हैं. ऐसे ही यावत् वैमानिक छता १ संतो विद्यमाना द्रव्यार्थतया नहि सर्वथैव सत्किचिदुत्पद्यते अर्थात् द्रार्थपने विद्यमान होवे किचिन्मात्र भी अवि१ द्यमानता न होवे अथवा पर्याय, भाव नारकी की अपेक्षा से द्रव्यसे नारकी उत्पन्न होवे अथवा नरक के आयुष्य से है भाव नारकी उत्पन्न होवे सो छता २ खरश्रृंगवत् जो भाव सो अछता. नववा शतकका बत्तीसवा उद्देशा 98800
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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