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________________ शब्दार्थ १ चे० चैत्य सा० स्वामी स. पधारे ५० परिषदा णि नीकली ध० धर्म क० कहा ५० परिगदा प० पीछी है। गइ ते. उस काल ते. उस सपय में पा. पार्श्वनाथ के शिष्य ग. गांगेय अ. अनगार जे०, जहां स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर ते. तहां उ० आये उ. आकर स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर की अ० नजदीक ठि० खडा रहा कर स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर को एक ऐसा व. बोले सं०१ १२७० 2 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी सामी ममोसड्, परिसा णिग्गया, धम्मो कहिओ, परिसा पडिगया,॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं पासावच्चिजा गंगेयं णामं अणगारे जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवा गच्छइ उवागच्छइत्ता समणस्स भगवओ महावीरस्स अदूरसामंते ठिच्चा, समणं भगवं महावीरं एवं वयासी संतरं भंते ! णरइया उववजंति, निरंतरं णेरइया उववजंति ? गंगेया : संतरंपि णेरइया उववज्जंति निरंतरंपि णेरइया उववज्जंति, ॥ संतरं भंते ! कितना गहन है यह बताने के लिये बत्तीसवे उद्देशे में गांगेय अनगार के प्रश्न कहते हैं. उस काल उम समय में वाणिज्य ग्राम नामक नगर था. उस के दूतिपलाश नामक उद्यान में श्री श्रमण भगवंत महावीर - स्वामी पधारे. परिषदा वंदने को आई. धर्मोपदेश सुनकर पीछी गई. उस काल उस समय में पार्श्वनाथ सामी के अपत्य श्री गांगेय अनगार जहां श्रमण भगवंत महावीर स्वामी थे वहां आये और पाप्त उपस्थित प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव महायजी ज्वालापसादजी * भावार्थ 1
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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