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विभंगनाणेणं समुप्पन्ने गं जीवेवि जाणइ अजीवेवि जाणइ, पासंडत्थे सारंभे सपरिग्गहे संकिलस्समाणेवि जाणइ, विसुज्झमाणेवि जाणइ सेणं पुत्वामेव सम्मत्तं पडिवज्जइ, समणधम्म रोएइ २, चरित्तं पडिवजइ २, लिंगं पडिवजइ, ॥ तस्सणं तेहि मिच्छत्त. पज्जवेहि, परिहायमाणेहिं २, सम्मइंसण पज्जवेहि वड्डमाणहिं २, से विभंगे अन्नाणे सम्मत्त परिग्गहिए खिप्पामेव ओही परावत्तइ ॥ ११ ॥ सेणं भंते ! कइसु लेस्सासु
होज्जा ? गोयमा ! तिस विसुद्ध लेस्सासु होजा, तं. तेउलेस्साए पम्हलेस्साए, भावार्थ अर्थ चेष्टा के ज्ञान सन्मख होकर विचार करता हुवा, धर्म ज्ञान का पक्ष रहिन निर्णय करता हुवा इस तरह से
धर्मालोचना करता हुवा विभंग ज्ञान की प्राप्ति हावे. वह बाल तपस्वी उत विभंग ज्ञान में जघन्य अंगूल का असंख्यातवा भाग और उत्कृष्ट असंख्यात हजार योजन जाने देखे. ऐसा विभंग ज्ञानी जीव व अजीव को जाने. पाखंडियों के व्रत आरंभ व परिग्रह युक्त जाने, संक्लेशमान होता हुवा जाने, अल्प विशद्धमानपा मे अल्प विशुदमान भी जाने. जब सम्यक्त भाव को प्राप्त होवे तब सम्यक्त्व प्रतिपन्न होवे सम्यक्ती बना हुवा सत्य साधु धर्म की श्रद्धना करे, साधु के चिन्ह धारन कर उस के शेष रहे हवे मिथ्यात्व के पर्याय
समय २ कमी होते होवे सम्यक्त के पर्याय बढते रहे. जब वह विभंग ज्ञानी सम्यक्त्वी होता है तब 10 उस का विभंग ज्ञान अवधि ज्ञान के रूप में होता है ॥ ११ ॥ अब इन में लेश्या के बोलों का निरूपन है।
पंचांग विवाह पण्पत्ति ( भगवती ) सूत्र 488
18नामा शतका एकतीस