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________________ सूत्र १०% अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी छटुंछट्टेणं अनिखित्तणं तवो कम्मेणं उड्डे बाहाओ पगिज्झिय २ सूराभिमुहस्स आयावण भूमीए, आयावमाणस्स पगइभद्दयाए, पगइउवसंतयाए, पगइपयणुकोहमाण माया लोभगए, मिउमद्दवसंपन्नयाए. अल्लीणमाए, भद्दयाए, विणीययाए अन्नया कयाइ सुभेणं अज्झवसाणेणं, सुभेणं परिणामेणं लेसाहिं विसुज्झमाणीहिं २ अलीणयाए, तयावरणिज्जाणं कम्माणं खओवसमेणं ईहापोह मग्गण गवेसणं करेमाणस्स विभंगे नामं अन्नाणे समुपज्जइ सेणं तेणं विभंगनाण समुप्पन्नेणं जहन्नेणं अंगुलस्स असंखेजइ भागं उक्कोसणं असंखेज्जाई जोयणसहस्साई जाणइ पासइ, सेणं तेणं केवल ज्ञानावरणीय का क्षय हुवा है वे केवली प्रणिन धर्म यावत् केवल ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं ॥१०॥ कोई बाल तपस्वी निरंतर छठ छठ के उपवास करता होवे, दिन में सूर्य की सन्मुख दोनों हाथ ऊंचे रखकर मर्य के ताप की आतापना करता हो, वह स्वभाव से भद्रिक, उप्रशांत कषायवाला, क्रोध, मान, माया व लोभ को पतला करनेवाला, कोमल स्वभावी, निरभिमानी हो, भोगोपभोग में लीन न होवे, प्रकृति का नम्र होवे, इस तरह बाह्याभ्यांतर तप करते किसी वक्त तप करते शुभ अध्यवसाय परिणामों की निर्मलता से लेश्या की विशद्धि मे विभंग ज्ञान को आवरण करनेवाले कर्मों का क्षयोपशम होवे. फीर * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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