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________________ 4 शब्दार्थ उद्देशा ए. ऐसे स० सर्व अ० अठाइस उ० उद्देशा स. वह ए० ऐसे भं० भगवन् ॥१॥३०॥ -::- १ 11 रा० राजगृह में जा० यावत् ए. ऐमा व० बोले अ० अश्रुत भं० भगवन् के० केवली श्रावक के व नंतत्ति ॥ नवम सयस तीसइमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ९॥ ३-३० ॥ .: रायगिहे जाव एवं बयासी असाच्चाणं भंते ! केवलिस्सवा केवलिसावगस्सवा, भावार्थ योजन जावे वहां छ सो योजन के लम्बे चौडे आवे) अश्वकर्ण द्वीप ॥९॥ १९ ॥ हस्तीकर्ण द्वीप ॥९॥ २० ॥ कर्ण द्वाप ॥ १॥ २१ ॥ कर्ण प्रावरणद्वीप ॥९॥ २२ ॥ ( यह पांचना चौक हुवा लवण से समुद्र में सात सो योजन जावे वहां सात सो योजन के लम्बे चौडे ये द्वीप रहे हुवे हैं ) उल्कामुख ॥१॥२३॥ मेघ मुख द्वीप ॥ ९॥ २४ ॥ विद्युत् मुख द्वीप ॥ ९॥ २५ ॥ विद्यु दंत द्वीप ॥ ९ ॥ २६ ॥ (यह छठा चौक हुवा. लवण समुद्र में आठमो योजन जावे वहां आठसो योजन के लम्बे चौडे उक्त द्वीपों रहे हुवे हैं) घनदंत द्वीप ॥ १ ॥ २७॥ यष्टिदंत द्वीप ॥ १ ॥ २८ ॥ गूढ दंत द्वीप ॥९॥ २१॥ और शुद्ध दंत द्वीप ॥ ९ ॥ ३० ॥ यह सातवा चौक हुवा. लवण समुद्र में नव सो योजन जावे तब नवसो योजन के लम्बे चौडे उक्त द्वीप आते हैं. इन की लम्बाइ चौडाइ छोडकर शेष वर्णन एक रुक द्वीप जैसे जानना. अहो, भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं यह तीसरे उद्देशे से तीसवा उद्देशा समाप्त हुवा ॥ ९॥ ३-३०॥-0:-* गत उद्देशों में जो व्याख्या कही उसे केवल ज्ञानी जानते हैं. केवल ज्ञानी दो प्रकार के होते हैं. विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र नववा शतक का एक तीसवा उद्देशा242
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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