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शब्दार्थ म मनुष्य के ए०एक रुक दी द्वीप प० प्ररूपा गो मौतम जम्बूद्वीप में मं. मेरु पर्वत की दा दक्षिण
में चु. चुलहिमवन्त बा० वर्षधर प० पर्वत की उ० ईशान कोन के च. चरमान्त से ल० लवण समुद्र की उ० ईशान कोन में ति तीन जो• योजनशत उ० अवगाहकर ५० तहां दा दक्षिण के ए० एकरुक मनुष्य के ए. एक रुक द्वीप ५० प्ररूपा ति तीन जो० योजन सशत आ० लंबा चौडा नमव एगुण ।
नाम दिवे पण्णत्ते ? गोयमा ! जंबूद्दीवेदीवे मंदरस्स पब्वयस्स दाहिणेणं चुल्लहिमवं
तस्स वासहर पव्वयस्स उत्तरपुरच्छिमिल्लाओ चरिमंताओ लवणसमुई उत्तरपुरच्छिमेणं E तिण्णि जोयण सयाइं उग्गाहित्ता एत्थणं दाहिणिलाणं एगूरुय मणुस्साणं एगूरुय दीने
है नाम दीवे प० ॥ तिाण जायणसयाइं आयामविक्खंभेणं नवएगूणवन्ने जोयणसए भावार्थ .. राजग्रही नगरी के गुणशील नामक उद्यान में श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर
श्री गौतम सामी पूछने लगे कि अहो भगवन् ! दक्षिण दिशा के एकरुक मनुष्यों का एकरूक नामक द्वाप कहां है ? अहो गोतम ! इस जम्बूद्वीप में मेरु पर्वत की दक्षिण में भरत क्षेत्र की मर्यादा करनेवाला, चुलहिमवंत नामक पर्वत है उन की ईशान कौन में से लवण समुद्र में तीनमो योजन जावे वहां दक्षिण दिशा के एक रुक मनुष्यों का एक रुक नामक द्वीप रहा हुवा है. यह नोन सो योजन का लम्बा चौडा व नवसांगुनपञ्चाम योजन की परिधि वाला है. इस द्वीप में एक पमवर वेदिका व एक वनखंड चारों तरफ
48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी -