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शब्दार्थ जं. जो भं. भगवन् आआत्पामे उ० उदरे गमक संवरे तं-उन कोकि क्या उरुउद आया उ.
१७ उदीरे अ उदे नहीं आया अ. उदीरे उ उदे हैं आया उउदीगा योग्य उ उदारे उदयान्नर ५०पीछे काकीया कर्म० उदीर गो. गौतम णो नहीं उ उ आया उ उदीरे णो नहीं अाउदे नहीं आया
अप्पणाचेत्र गरहइ, अप्पणाचेव संवरइ, तंकिं उदिण्णं उदीरेइ, अणुदिन्नं उदीरेइ अणुदिन्नं उदीरणा भवियं कम्म उदीरेइ, उदयाणंतरं पच्छाकडं कम्मं उदीरेइ ? गोयमा ! नो उदिण्णं उदीरेइ, णो अनुदिण्णं उदीरेइ, अनुदिण्णं उदीरणा भवियं कम्म
उदीरेइ, नो उदयाणंतरं पच्छाकडं कम्मं उदीरेइ ॥ जंतंभंते : अणुदिन्नं उदीरणा भावार्थ उदय आया हुवा उदीरता है, उदय नहीं आया हुवा उदीरता है, उदय में नहीं आया है परंतु उदीरणा
के योग्य जो उसे है उदीरता है, अथवा उदय के अनंतर समय में पश्चात् कृत कर्म को उदीरता है ? अहो गौतमः जो कर्म उदयमें आये हैं उनकी उदारणा करे नहीं क्यों की उदयों आये हुवे कर्मों की उदीरणा नहीं होती है, जो उदय में नहीं आये हैं उन की भी उदीर गा नही होती है क्यों की वे बहुत काल में उदय में }oo! आवेंगे इस लिये वर्तमान काल में उन की उदीरणा का अभाव है, जो उदय में नहीं आये हैं परंतु उ-17 दीरणा के योग्य हुवे हैं उन को उदीरते हैं और उदयांतर कृत कर्म को नहीं उदीरते हैं. अक्षो भगवन ! जो उदय में नहीं आये हैं और उदीरणा के योग्य बने हुवे उन को उदीरते हैं तो क्या
488 पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भगवती) सूत्र
-2008 पहिला शतकका तीसरा उद्देशा804265