SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 1259
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सत्र भावार्थ 48 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्त (भगत नाणावरणिजं तस्स मोहणिज्जं जरस मोहणिज्जं तस्स नाणावर णिज्जं ? गोयमा ! जस्स नाणावणिजं तस्स मोहणिज्जं सिय अत्थि सिय नत्थि, जस्स पुण मोहणिज्जं तरस नाणावरणिजं नियमं अस्थि ॥ जस्सणं भंते ! नाणावरणिजं तस्स आउयं एवं जहा वेयणिजेण समं भणियं तहा आउएणवि समं भाणियव्वं ॥ एवं नामेणवि एवं गोएणवि समं, अंतराइएणं जहा दंसणावरणिजेण समं तहेव नियमं परोप्परं भाणियव्वाणि ॥ ११ ॥ जस्सणं भंते ! दंसणावरणिजं तस्स वेयणिजं, जस्स वेयणिज्जं तस्स दंसणावरणिजं ? जहा नाणावर णिज्जं उवरिमेहिं सत्तहिं कम्मेहिं समं भणियं, तहा दंसणावरणिजंवि वरणीयवाले को मोहनीय होता भी है और नहीं भी होता है क्यों कि बारहवे गुणस्थान में प्रथम समय में मोहनीय का क्षय करता है और छेले समय में ज्ञानावरणीय का क्षय करता है. ओर मोहनीय कर्मवाले { को ज्ञानावरणीय अवश्य ही होता है. ज्ञानावरणीयवालेको आयुष्य व आयुष्यवालेको ज्ञानावरणीय वेदनीय जैसे जानना. ऐसे ही नाम व गोत्र का जानना, और अंतराय कर्म का दर्शनावरणीय कर्म जैसे कहना. अर्थात् दोनों परस्पर अवश्य होते हैं ॥। ११ ॥ अहो भगवन् ! जिस को दर्शनावरणीय उस को क्या ( वेदनीय और जिस को वेदनीय उस को क्या दर्शनावरणीय होता है ! अहो गौतम ! * आठवा शतकका दशचा उद्देशा १२२९.
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy