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42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मनि श्रा अमोलक ऋषिजी
अत्थेगइए दोच्चेणं भवग्गहणेणं सिज्झइ जाव अंतं करेइ, अत्थेगइए कप्पोवएसुवा कप्पातीतएसुवा उववज्जइ ॥ उक्कोसियाणं भंते ! दंसणाराहणं आराहेत्ता कइहिं भवग्गहणेहिं एवं चेव ॥ उक्कोसियाणं भंते ! चरित्तारायणं आराहेत्ता एवं चेव, णवरं अत्थेगइए कप्पातीतएसु उववज्जइ ॥ मज्झिमिएणं भंते ! नाणाराहणं आराहेत्ता कइहिं भवग्गहणेहिं सिज्झइ जाव अंतंकरेइ ? गोयमा अत्यंगइए दोच्चेणं भवग्गहणेणं सिज्झइ जाव अंतंकरेइ, तच्चंपुण
भवग्गहणं णाइक्कमइ ॥ मज्झिमियंणं भंते ! दसणाराहणं आराहेत्ता एवं चेर हे उस को उत्कृष्ट, मध्यम व जघन्य चारित्र आराधना होती है और जिस को उत्कृष्ट चारित्र आराधना है उस को निश्चय ही उत्कृष्ट दर्शन आराधना होती है. अहो भगवन् ! उत्कृष्ट ज्ञान आराधनावाला कितने भव में सीझे बुझे यावत् सब दुःखों का अंत करे ? अहो गौतम ! कितनेक उसी भव में सीझे कितनेक दूसरे भव में सीझे यावत् अंतकरे और कितनेक कल्प में अथवा कल्पातीत में उत्पन्न होवे. अहो १ गवन् ! उत्कृष्ट दर्शन आराधना वाला कितने भव में सीझे ! अहो गौतम ! उत्कृष्ट ज्ञान आराधना जैसे कहना. अहो भगवन् ! उत्कृष्ट चारित्र आराधना वाला कितने भव में सीझे यावत् अंत करे ? अहो गौतम !
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी*
भावार्थ