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शब्दाथ
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भं. भगवन पवाद कि किससे प उत्पन हार गो गौरमजा: जोगने पर उत्पन्न होवे जो जोग कि किसमे प० उत्पन्नाचे गो गौतम बी०वीर्यमे प उत्पन्न व वी वीर्य कि किसम उम्पन्न होव गशरीर मे |
मोहणिज कम्म बंधति ? गोयमा ! पमाद पच्चयं, जोगानिमित्तंच ॥ सेणं भंते ! पमाद
किंपबहे ? गोयमा ! जोगप्पबहे । सेणं भंते ! जोए किंपवह ? गोयमा ! वीरियप्पवहे। F सेणं भंते : वीरिए किंयवहे ? गोयमा : सरीरबहे । सेणं भंते सरीरे किंपवहे :
मोहनीय कर्म बांधता है ? हां गौतम ! जीव कांता मोहनीय कर्म बांधता है. ओ भगवन ! जीव कैसे कांक्षा ( मिथ्यात्व ) मोहनीय कर्म बांधता है ! अहो गौतम प्रसाद न्यायक व योग निमित्त मे. अहोई । भगवन् : प्रमाद किस कारन से प्रवर्ते अर्थात् कै उत्पन्न होवे ! अहो गौतम : मन प्रमुख योग के व्यापार में प्रमाद उत्पन्न होवे. अहो भगवन : योग कैले उत्पन्न होये! अहो गौतम बीयतिराय कर्म । के क्षयोपशम से उत्पन्न हुवा जो जीव परिणाम उनमे योग उत्पन्न होवे. अहो भगवन् : वीर्य कैसे उत्पन्न होवे ? अहो गौतम : वीर्य के दो भेद सकरण वीर्य और अकरण वीर्य. उस में अलेशी केवली समस्त पदार्थ जानते व देखते को सही केवल ज्ञान केवल दर्शन प्रयुनते को जो अप्रतिवाती परिणाम विशेष भाव होवे उसे अकरण वीर्य कहते हैं उस का यहाँपर अधिकार नहीं है. परंतु ०७ यहाँ पर मन वचन करण साधन सलेशीजीव प्रदेवात्मक व्यापार मोमकरण वीर्य ग्रहण कीया है और
भावार्थ
A8- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र
86023 पहिला शतक का तीसरा उद्देशा