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'भावार्थ
49 अनुवादक - बालब्रह्मची श्री अमोलक ऋषिजी
भंते! कइविहा ? एवं चेव तिविहावि ॥ एवं चरिताराहणावि ॥ ३ ॥ ज भंते उक्कोसिया नाणाराहणा तस्स उक्कोसिया दंसणाराहणा जस्स उक्कोसिया दंसणाराहणा तस्स उक्कोसिया नाणाराहणा ? गोयमा ! जस्स उक्कोसिया नाणाराहणा तस्स दंसणाराहणा उक्कोसा वा, अजहण्णमणुक्कोसावा, जस्स पुण उक्कोसिया दंसणाराहणा तस्स नाणाराहणा उक्कोसा वा जहण्णावा अजहन्नमणुक्कोसावा । जस्सणं भंते! उक्कोसिया नाणाराहणा तस्स उक्कोसिया चरित्ताराहणा, जस्स उक्कोसिया चरिताराहणा तस्सुकोसिया पराधक शंकादि दोष युक्त. ऐसे ही चारित्र आराधक के भी तीन भेद होते हैं ? उत्कृष्ट चारित्र आराधनावाला यथाख्यात चारित्रीय हो२ मध्यम चारित्राराधक सामायिकादि में मध्यस्थ परिणामी होवे और ३ जघन्य चारित्राराधक सामायिकादि चारित्र शिथिलता पूर्वक पाले || ३ || अहो भगवन् ! जिस को उत्कृष्ट ज्ञान आराधना होती है उस को क्या उत्कृष्ट दर्शन आराधना होती है अथवा जिस को उत्कृष्ट दर्शन आराधना होता है उस को क्या उत्कृष्ट ज्ञान आराधना होती है ? अहो गौतम ! जिस को उत्कृष्ट ज्ञान आराधना होती है उस को उत्कृष्ट दर्शन आराधना और मध्यम दर्शन आराधना होती है. और जिस को उत्कृष्ट दर्शन आराधना होती है उस को जघन्य, उत्कृष्ट व मध्यम ज्ञान आराधना होती १ है. अहो भगवन् ! जिस को उत्कृष्ट ज्ञान आराधना होती हैं उस को क्या चारित्र आराधना
* प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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