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भावार्थ
- पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र
किं दंसबंधए सव्वबधए ? गोयमा ! देसबंधए, णो सव्वबंधए ॥ ४९ ॥ जस्सणं भंते ! कम्मासरीरस्स देसबंध सेणं भंते ! ओरालिय सरीरस्स जहा तेयगस्स वत्तव्यया भणिया तहां कम्मगस्सवि भाणियव्वा, जाव तेयासरीरस्स जाव देसबंधए णो सव्बंध || ५० || एएसिणं भंते ! सव्वजीवाणं ओरालिय वेउन्त्रिय आहारग तया कम्मा सरीरगाणं, देशबंधगाणं सव्वबंधगाणं अबंधगाणय कयरे कयरे जाव विसेसाहियावा ? गोयमा ! सव्वत्थोवा आहारंग सरीरस्स सव्वबंधगा, तस्सचेव
अहो
भगवन् ! जिस को कार्माण शरीर का देश बंध होता है उस को क्या उदारिक शरीर का बंधक होता {है ? अहो गौतम ! जैने तेजस शरीर का कहा, वैसे ही उदारिक, वैक्रेय, आहारक की साथ जानना और तेजस की साथ का भी बंध वैसे ही कहना ॥ ५० ॥ अहो भगवन् ! इन उदारिक, वैक्रेय, आहारक, तेजस व कार्मण शरीरवाले सब जीवों का सर्व बंधक, देश बंधक व अबंधक में कौन किस से अल्प बहुत यावत् विशेषाधिक हैं ? अहो गौतम ! १ सब से थोडे आहारक के सर्व बंधक क्यों कि चौदह पूर्व ज्ञान के धारक प्रयोजन होने पर आहारक शरीर करते हैं उस में भी सर्व बंध समय मात्र रहता है २ इस से आहारक के देश बंधक संख्यात गुने देश बंधका काल अधिक होने से ३ इस से वैक्रेय शरीर के सर्व बंधक असंख्यात गुने ४ इस वैक्रेय शरीरी देश बंधक असंख्यात गुने इस से तेजस कार्मण के अबंधक पर
* आठवा शतकका नववा उद्देशा
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