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________________ 4923 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8888 . उय कम्मभूमिग़ब्भ वतिय मणुस्साहारग सरीर प्पओग बंधे, नो आणड्डि पत्त पमत्त जाव आहारक सरीर प्पओग बंधे ॥ २७ ॥ आहारग सरीर प्पओग बंधेणं भंते कस्स कम्मस्स उदएणं ? गोयमा ! वीरिय सजोग सहव्वयाए जाव लद्धिंवा पडुच्च आहारग सरीर प्पओग नामाए कम्मस्स उदएणं आहारग सरीर प्पओग बंधे ॥२८॥ आहारग सरीर प्पओग बंधेणं भंते ! किं देसबंधे सव्यबंधे ? गोयमा ! देस बंधेवि, सव बंधेवि ॥ आहारग सरीर प्पओग बंधणं भंते ! कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! सव्वबंधे एक समयं, देस बंधे जहण्णेणं अंतो मुहत्तं, उक्कोसेणरि अंतो मनुष्य आहारक शरीर प्रयोग बंध है परंतु अमनुष्य आहारक शरीर प्रयोग बंध नहीं है. ऐसे ही अवगाहन, संठाण, यावत् ऋद्धिवाले प्रपत्त संयति सम्यग् दृष्टि पर्याप्त संख्यात वर्ष के आयुष्य वाले कर्म भामि ग मनुष्य आहारक शरीर प्रयोग बंध है. परंतु ऋद्धिविना के यावत् आहारक शरीर प्रयोग बंध नहीं है.॥२७॥ अहो भगवन् ! आहारक शरीर प्रयोग बंध किस कर्म के उदय से होता है ? अहो गौतम ! वीर्य सयोग तद् द्रव्य यावत् लब्धि आश्री आहारक शरीर प्रयोग नामकर्म के उदय से आहारक शरीर प्रयोगबंध होता है ॥ २८ ॥ अहो भगवन् ! क्या आहार शरीर प्रयोग बंध देशबंध या सर्वबंध है ? अहो गौतम ! देशबंध 488888 आठवा शतक का नववा उद्देशा 84 भावार्थ km
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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